Thursday, April 9, 2020

सदा रहेगा यदि कृतज्ञ मन


जीवन में कृतज्ञता का भाव जगे, इससे बढ़कर कुछ भी नहीं, दुःख से बचने का यह एक सरलतम उपाय है. जिन माता-पिता ने हमें जन्म दिया उनके प्रति तथा अपने पूर्वजों के प्रति जिसके हृदय में कृतज्ञता का भाव रहता है वह उनके आशीष बिन मांगे ही पाता है. हमारे भीतर उनका अंश है, हमारी जड़ें उनमें ही हैं, जितना -जितना हम भावनात्मक रूप से उनसे जुड़े रहेंगे उतना -उतना हम दूरदर्शी भी होंगे. इसके बाद अपने शिक्षकों व गुरुजनों के प्रति हृदय से आभारी होना है. जीवन के पथ पर चलने के लिए पग-पग पर हमें किसी न किसी की सहायता चाहिए, जिससे भी जितना भी सीखा है, उस हर आत्मा के प्रति कृतज्ञ होना है. कभी मित्रों ने हमने राह दिखाई, कभी पुस्तकों ने, कभी किसी घटना ने अथवा  किसी अनजान व्यक्ति ने ही अपने कृत्य या शब्दों से कुछ सिखाया, कभी-कभी उन सभी का आदर पूर्वक स्मरण करके आभार व्यक्त करना है. प्रकृति से भी हम कितना कुछ पाते हैं, सीखते हैं. इस जगत में सुबह से शाम तक हम अपने जीवन के लिए जिन-जिन पर आश्रित रहते हैं उन सभी के हम ऋणी हैं. जो व्यापारी हमें पदार्थ उपलब्ध कराते हैं तथा जो कृषक वे अन्न व वस्त्र उपजाते हैं, दोनों ही धन्यवाद के पात्र हैं. जो सफाई कर्मचारी सड़कें तथा हमारे घर साफ करते हैं, जो चिकित्सक हमारा इलाज करते हैं, जो सैनिक व सिपाही हमारी रक्षा करते हैं, जो अधिकारी व राजनीतिज्ञ देश की नीतियों का निर्धारण करते हैं, जो हमें  जीवनयापन के लिए नौकरी देते हैं, वे सभी हमारी कृतज्ञता के अधिकारी हैं. अपनी प्रार्थना में हर रोज उनमें से कुछ को शामिल करके हम अपने जीवन को सहज ही दुःख से मुक्त कर सकते हैं. 

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