Thursday, May 2, 2024

ध्यान, मुक्ति में भेद नहीं है

संत कहते हैं, साधक को हर सुबह अपने दिन की शुरुआत ऐसे करनी चाहिए जैसे कि वह पहली बार जगत को देख रहा है। ध्यान का अर्थ ही है,  हर पल को गहराई से महसूस करना, हर पल ओस की तरह ताज़ा है, अभी है अभी नहीं रहेगा। अतीत मृत हो चुका है। जब हम अतीत को भुला देते हैं तो भविष्य की आशंका भी नहीं रहती।केवल शुद्ध वर्तमान रह जाता है। परमात्मा की उपलब्धि वर्तमान में ही हो सकती है। अतीत और भविष्य हमें स्मृति या कल्पना से बांधे रखते हैं। जबकि हर आत्मा की पुकार स्वतंत्रता है।शिशु भी मुक्त होना चाहता है और वृद्ध भी, किसी को भी आदेश या शासन में रहना नहीं भाता। अनुशासन का अर्थ है, स्वयं पर स्वयं का लगाया गया प्रतिबंध, जिसके भीतर हम मुक्त हैं। जब अतीत का बोझ नहीं है और आने वाले कल की चिंता नहीं है तभी मन अपने शुद्ध व मुक्त स्वरूप का अनुभव कर सकता है। यही ध्यान है। 


9 comments:

  1. ध्यान लगाते ही कहानी याद आ जाती है कि कहा गया है : बन्दर बिलकुल नहीं सोचना है :)

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    1. ध्यान लगाना नहीं है, ध्यान में होना है, अथवा तो ध्यान देना है, स्वागत व आभार !

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  2. बहुत मुश्किल है .....पर नामुमकिन नहीं ..धीरे धीरे अभ्यास चल रहा है

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    1. यही सातत्य बनाये रखना है, शुभकामनाएँ !

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  3. सटीक , शुद्ध वर्तमान ही मुक्ति है

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    1. स्वागत व आभार मुदिता जी !

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  4. बहुत बहुत आभार यशोदा जी !

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