Wednesday, August 19, 2026

शक्ति केंद्र जब जागेंगे भीतर

विश्व को भारत की सबसे बड़ी देन यदि कोई है तो वह 'योग' है। योग हमें अपने भीतर केंद्रित होना सिखाता है। मानव के भीतर जो सुप्त शक्तियाँ हैं, उन्हें जगाने का उपाय बताता है। मानव देह में मूलाधार पर स्थित चक्र या केंद्र पर एक सकारात्मक व एक नकारात्मक, उत्साह और आलस्य, ये दो भाव विद्यमान हैं। आलस्य सभी को सहज ही प्रकृति द्वारा दिया गया है, उत्साह बीज रूप में विद्यमान है। इसीलिए हम आज के काम को कल पर टाल देते हैं। जब तक डेड लाइन न दी जाये, लोग काम पूरा नहीं करते। परीक्षा सिर पर न हो तो विद्यार्थी पढ़ाई नहीं करते। आलस्य का अर्थ है देह में ऊर्जा की कमी का अनुभव हो रहा है। योग के द्वारा ऊर्जा प्राप्त करके मन में उत्साह के बीज को अंकुरित करके इसे जगाया जा सकता है। इसी तरह स्वाधिष्ठान केंद्र पर भी दो भाव हैं, कामनायें तथा सृजन। यदि हम अपनी भौतिक इच्छाओं की पूर्ति में ही लगे रहेंगे तो सृजन की क्षमता बीज रूप में सुप्त रहेगी। योग के द्वारा हम इस शक्ति को भी जगा सकते हैं। कला, संगीत व साहित्य की तरफ़ यदि आपका रुझान कम है तो योग साधना के बाद वह सहज ही जगने लगेगा। मणिपुर चक्र पर ध्यान करके उदारता व मुदिता के बीजों को को जगाया जा सकता है, वरना प्रकृति से प्राप्त ईर्ष्या व लोभ की भावना जीवन भर दंश देती रहेगी। ह्रदय के केंद्र पर प्रेम जगता है तो साधक को सारे विश्व के प्रति अपनापन महसूस होता है। इस केंद्र पर प्रकृति ने हमें भय की भावना दी है, जो अपने अस्तित्त्व की रक्षा के लिए आवश्यक है, किंतु यदि हृदय में केवल भय ही भय हो तो तो व्यक्ति का पूरा विकास कैसे संभव हो सकता है। प्रेम का बीज फले-फूले इसके लिए योग साधना सहायक है। विशुद्धि चक्र पर प्रकृति ने दुख का भाव अनुभव करने की क्षमता दी है, जब कोई दूर जा रहा हो तो गला भर आता है, रोते समय गला रूँध जाता है। कृतज्ञता की भावना यहाँ बीज रूप में दी गई है, जिसे जितना बढ़ाया जाएगा, जीवन में समृद्धि बढ़ती जाएगी। आज्ञा चक्र पर क्रोध स्वाभाविक भावना है, लेकिन सजगता का बीज हमें रोपना है। तभी सहस्रार पर ऊर्जा का फूल खिलकर चारों ओर अपनी सुगंध फैलाएगा। यही योग का लक्ष्य है। 

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