Thursday, October 18, 2012

एक वही न दूजा कोई


सितम्बर २००३ 
ईश्वर का नाम भक्त के हृदय को पवित्र करता है, उसे नाम जपने में कभी आलस्य नहीं होता. अच्छा लगता है और एक वक्त ऐसा भी आता है जब नाम सुमिरन के अतिरिक्त बात करना भी बोझ मालूम पड़ता है. सचमुच अध्यात्म के मार्ग पर चलने वाले निराले होते हैं. जगत से उल्टा होता है उनका व्यवहार, वे संसारिक बातों में दक्ष न हों पर अपने चिर सखा के सम्मुख सत्य में स्थित होते हैं. ईश्वर के सम्मुख वे अपने पूर्ण होशोहवास में प्रस्तुत होते हैं और तभी तत्क्षण उसकी उपस्थिति का अहसास भी करते हैं. उन्हें वह इतना प्रिय, प्रियतर, प्रियतम लगता है कि उसके सिवा सब कुछ फीका लगता है. लेकिन यह जगत भी तो उसी का प्रतिबिम्ब है, उसी के कारण आकाश में नीलिमा का आभास होता है और जल में हरीतिमा का. वही भीतर है और वही बाहर है. वही हमें सम्भालता है वही हमारी रक्षा करता है. वही धर्म है, वही न्याय है, वही ज्ञान है, वही सदबुद्धि है, वही मंगल है, वही शिव है, वही जीवन है, वही जीवनदाता है, वह एक है पर उसके नाम अनेक हैं, उसके रूप अनेक हैं, वह सुखमय है, वह रसमय है, वह सुखद है, अद्भुत है, नित्य है, चिरसखा है, अनंत है, आनंद है,  शांति प्रदाता है, वही साधना है, वही साध्य है, वही साधन है, वही श्रेय है वही प्रेय भी !

7 comments:

  1. बेहद भावपूर्ण रचना अनीता जी

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  2. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तु‍ति ।

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  3. http://bulletinofblog.blogspot.in/2012/10/blog-post_19.html

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    1. रश्मि जी, आभार !

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  4. ईश्वर का नाम भक्त के हृदय को पवित्र करता है,

    इश्वर के अलौकिक स्वरुप का वर्णन .

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  5. अरुण जी, रश्मि जी, रमाकांत जी व सदा जी अप सभी का स्वागत व आभार !

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