Wednesday, December 26, 2012

राधे, राधे ! श्याम मिला दे



कान्हा हमारा परम सुह्रद है, हम उसे भुला देते हैं, प्रकृति के गुणों के अधीन होकर स्वयं को उससे पृथक मानते हैं, पर वह हमें चेताता है. हम उससे बिछड़ जाते हैं फिर मिल जाते हैं. प्रकृति और पुरुष का यह खेल अनन्तकाल से चल रहा है, जीव स्वयं को प्रकृति का अंश मानकर उस पर विजय प्राप्त करना चाहता है, पर प्रकृति स्वयं पुरुष के अधीन है, वह नित नए खेल दिखाती है ताकि थक-हार कर बंदा उसकी शरण में आ जाये. तब वह हमारी सहायक हो जाती है, गुणातीत होने पर हम नित नवीन आनंद का अनुभव कर सकते हैं, जो हमारा सहज स्वभाव है. सहजता को भुला देने पर हम कल्पनाओं के जाल में खुद को उलझा हुआ पाते हैं, पर मुक्ति हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है.

4 comments:

  1. पर मुक्ति हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है.
    बिल्‍कुल सही कहा आपने
    आभार

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  2. ज्ञान देती सुंदर प्रस्तुति,,,,
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    recent post : नववर्ष की बधाई

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  3. बहुत सुन्दर चिंतन...आभार

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  4. सदा जी, धीरेन्द्र जी व कैलाश जी आप सभी का स्वागत व हार्दिक आभार !

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