प्रकृति और पुरुष दोनों उसी तरह भिन्न हैं जैसे वाहन और उसका
चालक. गति वाहन में होती है, चालक में नहीं, इसी तरह सारी क्रिया प्रकृति में है,
पुरुष में नहीं. वाहन यदि टूट जाये तो दूसरा लिया जा सकता है, इसी तरह पंचभूतों से
बनी देह जो प्रकृति का ही अंश है, यदि नष्ट हो जाये तो पुरुष को कोई अंतर नहीं
पड़ता, उसे दूसरी देह मिल जाती है. यदि किसी का वाहन क्षतिग्रस्त हो जाता है, तो वह
व्यक्ति दुखी होकर उसका शोक मनाये ही ऐसा जरूरी नहीं, सुखी या दुखी होना उसकी
स्वाधीनता है, इसी तरह यदि देह रोगी हो जाये या वृद्ध हो जाये, अथवा नष्ट हो जाये
तो सुख या दुखी होना पुरुष यानि आत्मा की स्वतन्त्रता है. कर्मों का फल सुख या
दुःख के रूप में मिलता है पर सुखी या दुखी होना केवल हमारे बोध के ऊपर निर्भर करता
है. हर मानव के मन की गहराई में एक स्थान ऐसा है जो निरंतर एकरस है, जो मुक्त है,
यदि कोई उसे जुड़ जाये तो कभी अपनी इच्छा के विपरीत सुख-दुःख का अनुभव उसे नहीं
होगा, वह सदा साक्षी ही बना रहेगा.
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Friday, August 9, 2019
Thursday, March 8, 2018
शिव शक्ति जब एक हुए
८ मार्च २०१८
स्त्री और पुरुष दोनों एक-दसरे के पूरक हैं, प्रतिद्वंद्वी नहीं. जो
इस बात को जानते हैं, समझते हैं, वे जीवन को एक सहज आनंदित करने वाला अवसर पाते
हैं और जो इसे नहीं जानते वे जीवन को संघर्ष बना लेते हैं. प्रकृति और पुरुष के
संयोग से ही इस सृष्टि का निर्माण हुआ है. शक्ति के बिना शिव कुछ भी नहीं है.
स्त्री अपने प्रेम और स्नेह के बल पर पुरुष के जीवन में सौंदर्य भर देती है और
पुरुष अपने साहस और धैर्य के बल पर उसके जीवन को सुखपूर्ण बनाता है. दोनों के
सहयोग से ही परिवार नाम की संस्था का जन्म होता है और उसकी स्नेह भरी छाया में
संतान को संस्कारित पोषण मिलता है.
Friday, October 31, 2014
भीतर झरना प्रेम का
अप्रैल २००७
प्रकृति
और पुरुष ये दो तत्व हैं. आत्मा यानि पुरुष और देह, मन, बुद्धि, चित, अहंकार ये सब
प्रकृति है. क्रोध, लोभ, मोह, मद, मान आदि सूक्ष्मतर प्रकृति है. माया हमें
प्रकृति में ही घुमाती रहती है, आत्मा से मिलने की फुर्सत ही नहीं देती. जीवन में
यदि विश्राम आ जाये तो माया को पार करने का उपाय आ जाता है. विश्राम आता है
निष्काम होने में. सहज, स्वाभाविक आत्मनिवेदन के बाद ही निष्कामता आती है. अपने
गुण तथा अवगुण दोनों को समर्पित करके स्वय खाली हो जाना ही आत्मनिवेदन है.
जितना-जितना हम भीतर से खाली होते जाते हैं उतने-उतने अहंकार से मुक्त होते जाते
हैं. माया तभी तक वार करती है जब तक अहम है, हम जब तक हम हैं. जब कुछ भी नहीं बचा
तो केवल आत्मा ही रह जाती है जो स्वयं शून्य है. वह अनंत है, सत्य है, प्रेम है,
शांति है. उसी आत्मा को जो सर्वगुण सम्पन्न है, कृष्ण का नाम दे दिया गया. जिसका
रूप अनुपम है, मधुर है वह कृष्ण आत्मा रूप में हरेक के हृदय में विराजमान है. वही
इस सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है, वही वेदान्तियों का ब्रह्म है तथा उसी की
शक्ति यह प्रकृति है.
Wednesday, December 26, 2012
राधे, राधे ! श्याम मिला दे
कान्हा हमारा परम सुह्रद है, हम उसे भुला देते हैं, प्रकृति के गुणों के अधीन होकर
स्वयं को उससे पृथक मानते हैं, पर वह हमें चेताता है. हम उससे बिछड़ जाते हैं फिर
मिल जाते हैं. प्रकृति और पुरुष का यह खेल अनन्तकाल से चल रहा है, जीव स्वयं को
प्रकृति का अंश मानकर उस पर विजय प्राप्त करना चाहता है, पर प्रकृति स्वयं पुरुष
के अधीन है, वह नित नए खेल दिखाती है ताकि थक-हार कर बंदा उसकी शरण में आ जाये. तब
वह हमारी सहायक हो जाती है, गुणातीत होने पर हम नित नवीन आनंद का अनुभव कर सकते
हैं, जो हमारा सहज स्वभाव है. सहजता को भुला देने पर हम कल्पनाओं के जाल में खुद
को उलझा हुआ पाते हैं, पर मुक्ति हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है.
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