Saturday, March 1, 2014

नीलगगन सा मन हो जाये

अगस्त २००५ 
हम जितना-जितना सजग होकर व्यवहार करते हैं, हमारा भीतर खाली होता जाता है क्यों कि तब कोई ऐसी चेष्टा नहीं होती जिसके लिए भीतर दुःख, पछतावा या उद्वेग हो, बल्कि शांत भाव जो हमारी सहज अवस्था है, वही बना रहता है, जैसे आकाश अपने सहज रूप में शुभ्र है, नीला है तो खाली है, खाली मन में ही परमात्मा का निवास होता है, संतों का मन ऐसा ही होता है जहाँ से ईश्वरीय गुणों का प्रसार होता है. हमारे भीतर भी सरलता, सहजता, विश्वास, आस्था, आत्मीयता इन सारे गुणों का खजाना है, जिन्हें बाँटना है, हमें सजगता की मशाल लेकर इन तक पहुंचना है, ताकि वह पर्दा न रहे जो हमारी सहजता और हमारे बीच है, दूर हो सके. हम तभी सच्ची मुक्ति का अनुभव कर सकते हैं, मुक्ति की आकांक्षा करने वाला मन यदि स्वयं ही मुक्ति का विरोधी बना रहे तो यह सम्भव नहीं होगा ! 

2 comments:

  1. जैसे आकाश अपने सहज रूप में शुभ्र है, नीला है तो खाली है, खाली मन में ही परमात्मा का निवास होता है, संतों का मन ऐसा ही होता है......perfect..

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