Wednesday, March 5, 2014

सागर ही अपनी मंजिल है

सितम्बर २००५ 
हमारे मन का प्याला ख्वाहिशों से कभी भी लबालब भर नहीं सकता और भरे बिना उसे चैन नहीं मिलता, तो उसे भरने का एकमात्र उपाय है उसे सागर में ले जाकर तोड़ दिया जाये या छोड़ दिया जाये. सागर उसमें तभी समा सकेगा जब वह अपनी सीमाएं नहीं बाँधेगा. अहंकार वश ही हम सीमाएं बांधते हैं, जब अभाव का अनुभव होता रहेगा फिर आनन्द कहाँ से आएगा. सारे अभाव तभी मिटते हैं जब हम स्वयं में स्थित हो जाते हैं. मन का प्याला जब आत्मा के सागर में जाकर टूटता है तो कोई अभाव नहीं रहता. तब कुछ पाने की ख्वाहिश नहीं रहती. भीतर तब प्रकाश ही प्रकाश हो जाता है, बाहर फिर मन नहीं लगता, बार-बार भीतर ही दौड़ता है. परमात्मा को फिर याद करना नहीं पड़ता वह खुदबखुद याद आता है.



6 comments:

  1. मन का प्याला जब आत्मा के सागर में जाकर टूटता है तो कोई अभाव नहीं रहता. तब कुछ पाने की ख्वाहिश नहीं रहती. भीतर तब प्रकाश ही प्रकाश हो जाता है....
    सच...और सच...

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  2. बात 'सौ आने' सच है!

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  3. बहुत सुंदर विचारों का सृजन...!

    RECENT POST - पुरानी होली.

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  4. सुखसागर है मञ्जिल अपनी जहॉ बसा है वह परमेश्वर ।

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  5. राहुल जी, पारुल जी, धीरेन्द्र जी व शकुंतला जी आप सभी का स्वागत व आभार !

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति। । होली की हार्दिक बधाई।

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