Friday, October 17, 2014

खिला खिला हो मन का उपवन


हमारे मन में न जाने कितने-कितने जन्मों की कामनाओं के संस्कार पड़े हुए हैं और उसी तरह न जाने कितने सद्गुण, खजाने स्नेह भाव भी पड़े हैं. यह बीज समुचित वातावरण पाते ही अंकुरित हो जाते हैं. हम जो भी पढ़ते-सुनते हैं या जिन व्यक्तियों के संपर्क में आते हैं, जिस प्रकार का भोजन ग्रहण करते हैं, उस स्थान, व्यक्ति या भोजन की प्रकृति हमें अवश्य प्रभावित करती है. संग का मानसिक उन्नति पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है. हमें जो चाहिए उसी के अनुकूल खाद व पानी दें तो मन का उपवन व्यर्थ के खर-पतवार तथा जंगली काँटों से मुक्त रहेगा. ईश्वर प्रकट हो सकेगा. अच्छाई और बुराई के बीच का महाभारत हर एक को अपने भीतर लड़ना है. यदि ईश्वर की निकटता का अनुभव करना, इस सृष्टि के रहस्य पर से पर्दा उठाना यदि जीवन का लक्ष्य नहीं तो मानव जीवन की सार्थकता ही नहीं रह जाती. इससे छोटे लक्ष्य तो हमें विपरीत दिशा में ले जाते हैं.   

5 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा - शनिवार- 18/10/2014 को नेत्रदान करना क्यों जरूरी है
    हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः35
    पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें,

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    1. आभार दर्शन जी !

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  2. सुन्दर अभिव्यक्ति

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  3. Bahut sahi likha hai aapne jaise beej ko khaad paani milega waisa fal hoga..jaisi sangati waisa hi rangat hoga ..hame swayam ko accha banana hai uske liye zaruri hai acche vatavaran ko banaaye usme rahein .... Behaad umda prernasprad prastuti !!

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  4. कुसुमेश जी व परी जी, स्वागत व आभार !

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