‘मैं’ ‘मेरे’ का भाव उत्पन्न करने वाली, राग-द्वेष पैदा करने वाली, एक दायरे में सीमित करने वाली तथा अखंड तत्व के प्रति उदासीन रहने वाली चार तरह की बुद्धियाँ अनर्थकारी हैं। ऐसी बुद्धि, जो ईश्वरीय ऐश्वर्य का अनुसन्धान करने वाली हो, प्रकृति के रहस्यों को समझने वाली, उसको सराहने वाली हो, अर्थकारिणी है। ईश्वर का सौन्दर्य चारों ओर बिखरा पड़ा है। ब्रह्मांड के असंख्य नक्षत्रों, ग्रहों, सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी और पृथ्वी पर बर्फीले पर्वत, नीला सागर, हरियाली, विशाल वन संपदा उसके ऐश्वर्य के रूप में हमें प्राप्त है और उसका वैभव मीठे फलों, पंछियों की बोली और जीवन के पोषक तत्वों के रूप में हमें प्राप्त है।
अच्छी पोस्ट. सादर अभिवादन
ReplyDeleteस्वागत व आभार!
Deleteआपने बहुत सरल शब्दों में गहरी आध्यात्मिक बात कही है। सच है कि जब हम केवल ‘मैं’ और ‘मेरा’ तक सीमित रहते हैं, तब हमारा दृष्टिकोण भी छोटा हो जाता है। बहरहाल, मेरा यहाँ आने का एक कारण और भी है। हम लोग मुंशी प्रेमचंद जी की आगामी पुण्यतिथी ३१ जुलाई २०२६ के अवसर पर प्रेमचंद महोत्सव के अंतर्गत "५० दिनों में ५० कहानियाँ" बनाने, सुनाने (और जुटाने की भी!) की ओर प्रयासरत है. अगर आपकी रूचि हो तो इस अभियान में आपका सहर्ष स्वागत है.
ReplyDeleteअधिक जानकारी आपको यहाँ मिल जाएगी - HindiDiscussionForum dot com
धन्यवाद!