Saturday, July 8, 2017

गुरू हमारे मन मन्दिर में

९ जुलाई २०१७ 
जीवन में गुरू का पदार्पण एक अद्वितीय घटना है, इसे एक महान घटना भी कहा जाये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. जब किसी के मन में सत्य के लिए, गुरू के लिए प्यास जगती है तो परमात्मा की व्यवस्था से गुरू का आगमन होता है. यह सही है कि शिष्य ही गुरू को नहीं खोजता गुरू भी किसी अदृश्य शक्ति के द्वारा शिष्य तक पहुँच जाते हैं. जब तक जीवन में गुरू की सच्ची आवश्यकता महसूस नहीं हुई है तब तक हम उसके महत्व को समझ नहीं पाते, लेकिन उसकी इतनी कृपा है कि अपने ज्ञान और प्रेम के बल पर वह हमारे मन में उस चाह को भी जगाता है. इसलिए चाहे अभी हमें गुरू के महत्व की जानकारी हो या न हो, गुरू के चरणों में बैठकर ज्ञान प्राप्त करने की ललक भीतर जगाएं और व्यास पूर्णिमा के इस सुंदर पर्व पर अपने जीवन को सुंदर दिशा दें. 

Friday, July 7, 2017

नये संस्कार उगें जब मन में

१० जुलाई २०१७ 
कभी-कभी न चाहते हुए भी हमसे ऐसे कृत्य हो जाते हैं, जिन पर बाद में पश्चाताप होता है. कभी मुख से ऐसे वचन निकल जाते हैं जिन्हें बोलने के बाद हमें लगता है, इनकी जरूरत ही नहीं थी. इनका कारण हमारे भीतर के क्रोध आदि विकार हैं, जो जरा सी परिस्थिति भी अनुकूल पाते ही सिर उठा लेते हैं अथवा तो जब उनके फल देने का वक्त होता है, परिस्थिति पैदा कर लेते हैं. क्रोध, मान, मोह, माया आदि पूर्व कर्मों के फल हैं. भीतर जो भी भाव उठते हैं वे संस्कारों के कारण होते हैं, संस्कार पूर्वकर्मों के अनुसार होते हैं, हमें उनसे प्रभावित होने की आवश्यकता नहीं है. स्वयं का ज्ञान होने पर ही यह पता चलता है. आत्मा के गुणों के आधार पर जो कर्म हम करते हैं, वे ही नये संस्कार बनाते हैं, अन्यथा हम बार-बार पुराने ढंग से ही जिए चले जाते हैं. सम्मान कभी भी वर्चस्व से नहीं समानता से प्राप्त किया जाता है, प्रेम और परोपकार से प्राप्त किया जाता है.

Wednesday, July 5, 2017

स्वाध्याय का फूल खिले

६ जुलाई २०१७ 
सुबह से शाम तक हम अनगिनत सूचनाओं को प्राप्त करते हैं, अख़बार, टेलीविजन, पत्रिकाएँ, मित्रों व पुस्तकों के माध्यम से हम जगत का ज्ञान प्राप्त करते हैं. आजकल तो सुबह-सुबह मोबाइल पर ही सुंदर ज्ञान के सूत्र पढने को मिलते हैं किन्तु इस ज्ञान से हमारा आध्यात्मिक विकास नहीं होता. इसके लिए तो साधना के पथ पर कदम रखना ही होगा. जीवन में एक अनुशासन हो, नियमित योगाभ्यास व व्यायाम हो, उचित समय पर सोना व जगना हो और स्वाध्याय हो. स्वाध्याय का अर्थ है केवल शास्त्रों का अध्ययन नहीं है, इसका एक अर्थ है स्वयं का अध्ययन. स्वयं का ज्ञान होने पर ही हम स्वयं का अध्ययन कर सकते हैं. गुरू अथवा शास्त्रों के माध्यम से हमें स्वयं का पता चलता है. स्वयं का ज्ञान ही हमें संसार की दौड़ से मुक्त कर देता है, यही वास्तविक ज्ञान है. इसके होने पर जीवन पूर्ववत् चलता रहता है बस मन जिस शांति व स्थिरता का अनुभव करता है, वह किसी बाहरी घटना से खंडित नहीं होती.

Tuesday, July 4, 2017

मन तू अपना मूल पिछान

५ जुलाई २०१७ 
साधना के पथ पर चलते समय इस बात का निरंतर ध्यान रखना होगा कि हम अपने मूल स्वभाव की और जा रहे हैं या नहीं. ऐसा नहीं कि स्वयं को विशेष मानकर अथवा तो औरों को अपने पथ में बाधा मानकर हम मन में विकार जगा लें. हमारी दिशा सही होनी चाहिए. अध्यात्म के पथ पर जो धैर्यवान है, वह एक दिन मंजिल तक अवश्य पहुँचेगा. जब तक हम अपन शुद्ध स्वरूप को नहीं जानते, परमात्मा के सच्चे स्वरूप को नहीं जान सकते. शांति, प्रेम, आनंद आदि आत्मा का स्वभाव है, हमें इनका उपयोग करना है. ऐसा करने से सबसे पहले उसका लाभ स्वयं को मिलता है तथा बाद में औरों को मिलता है. 

Monday, July 3, 2017

ज्ञान बिना सुख इक सपना है

४ जुलाई २०१७ 
संत कहते हैं, सुख के पीछे जाने से दुःख पीछे आता है, ज्ञान के पीछे जाने से सुख पीछे आता है. समझदारी तो इसी में हुई कि हम ज्ञान का अनुशीलन करें. भगवद्गीता में कृष्ण ने सुंदर शब्दों में ज्ञान की व्याख्या की है. वैराग्य की भावना, इन्द्रियों का निग्रह, शोक और भय से मुक्ति, अहंकार का त्याग ये सभी ज्ञान के लक्षण हैं. दुःख का कारण सुख की लालसा है, मिल जाने पर उसके खो जाने का भय भी दुःख का कारण है और बाद में उसकी स्मृति भी दुःख का कारण है. ज्ञान का चिंतन करने से ही मन शांति का अनुभव करता है और शांति के बाद उपजा सुख शाश्वत होता है. 

Sunday, July 2, 2017

स्वयं को जिसने जान लिया है

३ जुलाई २०१७ 
हम परमात्मा की पूजा करते हैं, उससे अपने व परिवार जनों के सुख के लिए प्रार्थना करते हैं. किन्तु मन में किसी न किसी रूप में संदेह बना ही रहता है. यदि किसी को उस पर पूर्ण विश्वास हो तो मौन ही उसकी प्रार्थना होगी, तब उसे कुछ माँगने की जरूरत ही नहीं होगी. परमात्मा से हमारा रिश्ता बिलकुल वैसा ही है जैसा खुद के साथ होता है. जितना-जितना खुद से हमारा परिचय प्रगाढ़ होता जाता है, खुदा हमारे करीब होता जाता है. यदि कोई स्वयं को बेशर्त प्रेम करता है तो परमात्मा को प्रेम करता ही है. स्वयं को प्रेम करने के लिए खुद को जानना भी तो आवश्यक है. यदि हम स्वयं को जानते हैं तो ही उसे भी जानते हैं.

Saturday, July 1, 2017

दो के पार ही वह मिलता है

२ जुलाई २०१७ 
बादल बरस रहे हैं, धरती हरी-भरी हो रही है. कुछ लोग इस वर्षा का आनंद उठा रहे हैं तो कितने ही लोग बाढ़ के कारण प्रभावित हुए हैं और अपने घरों से उन्हें सुरक्षित स्थान पर जाना पड़ा है. जीवन सदा ही विरोधाभासों से घिरा हुआ है. यहाँ दिन के साथ रात और सुख के साथ दुःख मिला हुआ है. हमारी नजर यदि द्वन्द्वों के पार एकरस अस्तित्त्व को देखने में सक्षम नहीं होती है तो हम जीवन को उसके वास्तविक रूप में कभी नहीं देख पाते. कभी हँसना तो कभी रोना यही तो जीवन नहीं हो सकता. सारी आपदाओं के पार भी एक ऐसी सत्ता है जो सदा निर्विकार है, जो हमारा मूल है. उससे मिलना ही जीवन से मिलना है.