Tuesday, January 28, 2014

सृष्टि चक्र है जाने कब से

जुलाई २००५ 
प्रत्यक्ष ज्ञान ही प्रज्ञा है और ऐसी समाधि जो प्रज्ञा की ओर ले जाये वही सम्यक समाधि है. कभी-कभी ध्यान में हमें ऐसे अनुभव होते हैं, जिनका वर्तमान जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं  होता, सम्भवतः वे हमारे पूर्व जीवन से सम्बन्धित होते हैं, तब ज्ञान होता है कि इस शरीर से कैसा मोह, न जाने कितने शरीर हम धारण कर चुके हैं, हर बार वही कहानी दोहराई जाती रही है, बस अब और नहीं, अब और इस झूले में नहीं बैठना जिसका एक सिरा ऊपर जन्म फिर नीचे मृत्यु की ओर ले जाता है. अब स्वयं को जानकर उसमें स्थित होना है, संतजन कहते हैं, पलक झपकने में देर लग सकती है पर अपने स्वरूप में स्थित होने में उतनी भी देर नहीं लगती. साधना के द्वारा हम अपने स्वरूप की झलक तो पा ही लेते हैं, पर यह स्थिति सदा बनी नहीं रहती, क्योंकि जब तक अहंकार शेष है पर्दा बना ही रहेगा. 

10 comments:

  1. एक सतत प्रयास चाहिए ....अपने आप से जुडने के लिए ....बहुत सुंदर बात अनीता जी ...!!

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    1. अनुपमा जी, सचमुच सतत साधना चाहिए

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  2. सुन्दर प्रस्तुति...

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  3. अब करो स्वांश ध्यान कृष्ण के स्वरूप के अंश की आराधना (रूप ध्यान ,मैडिटेशन आफ फ़ार्म )

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    1. सुंदर संदेश..आभार !

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  4. कृष्ण के चरणारविन्द की शरण में जाने के लिए आदर्श स्थिति है सम्बन्धों की आंच का नार्थ पोल बन जाना। आवाजाही से देहांतरण से मुक्ति का भी यही साधन है :कृष्ण- भक्ति।

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  5. अपने आप को पहचानने और स्व में स्थित होने का प्रयास अनवरत जारी रहना चाहिए...

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    1. कैलाश जी, यही परम लक्ष्य है

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  6. काफी उम्दा रचना....बधाई...
    नयी रचना
    "सफर"
    आभार

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