Wednesday, April 22, 2015

सोचे सोच न होइए जो सोचे लख वार

 जनवरी २००९ 
परमात्मा से मिलन हृदय से ही होता है बुद्धि से नहीं. बुद्धि शब्दों में उलझी रहती है, शास्त्रों में उलझी रहती है, हृदय तो आतुर होता है. बुद्धि आत्मरक्षा का उपाय खोजती है, हृदय समर्पण है. बुद्धि संसार में कहीं पहुंचा सकती है पर परमात्मा के राज्य में ले जाने में वह समर्थ नहीं है. बुद्धि और हृदय में फासला अधिक नहीं है पर अपनी बुद्धि पर हम जरूरत से ज्यादा भरोसा करते हैं, उसे त्यागना नहीं चाहते, नहीं तो कब का परमात्मा को अपना बना चुके होते. संसार में हम तृप्ति का अनुभव नहीं करते फिर भी डरते हैं उस डगर पर जाने से. जिस क्षण बुद्धि चुप हो जाती है भीतर शांति छा जाती है. परमात्मा तब आमने–सामने होता है. एकांत में भक्त या साधक के पास परमात्मा के सिवा कोई दूसरा नहीं होता. भीड़ में वह कभी इधर-उधर हो जाता है और जिस क्षण मन किसी कामना से भर जाता है या बुद्द्धि वाद-विवाद में उलझ जाती है तो वह कहीं छिप जाता है. परमात्मा एकक्षत्र राज्य करता है, उसके सामने कोई ठहर नहीं सकता. वह रसपूर्ण परमात्मा नित नूतन रस बरसाता है, वह अनंत है, अपार है !

4 comments:

  1. Very nice post.. & welcome to my new blog post

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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (24.04.2015) को "आँखों की भाषा" (चर्चा अंक-1955)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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  3. बहुत बहुत आभार !

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  4. कोई तो है—जो इस संसार में क्षुद्रतम को भी
    थामे हुए है---यही भाव पर्मात्मा से जोडता है.

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