जनवरी २००४
हमें भोक्ता नहीं ज्ञाता बनना है, दृश्य नहीं द्रष्टा बनना है. भोक्ता सुख-दुःख का
भागी है, ज्ञाता उन्हें जानता अवश्य है पर
उनसे अपने को लिप्त नहीं करता. वृत्तियाँ तब भी रहती हैं, पर द्रष्टा बन कर हम उन्हें अपने से पृथक जानते हैं. वे आती हैं,
जाती हैं, हम सदा अपने स्वरूप में बने रहते हैं, संसार चक्र से जीतेजी छूट जाते
हैं. हम शक्ति, ऊर्जा, प्रेम, सामर्थ्य, ज्ञान तथा आनंद के रस से सराबोर हो जाते
हैं. यह कोई काल्पनिक अवस्था नहीं है, यह अनुभूत अवस्था है, हजारों लोगों ने इसे
सत्य कहा है, स्वयं अनुभव किया है. अज्ञान ही हमें इससे दूर रखता है, अज्ञान अपने
होने का, जो देह या मन को ही स्वयं मानता है वह कभी इसे प्राप्त नहीं कर सकता, ये
तो साधन मात्र हैं. इनसे एक होने पर हम अपने पद से नीचे गिर जाते हैं, हम मंगते हो
जाते हैं, भिखारी कभी भी संतुष्ट नहीं हो सकता, जो अभाव का अनुभव करे वह भिखारी ही
तो हुआ, हम बादशाहों के बादशाह होकर क्यों न जियें !