काव्य कल्पना की वायवीय उड़ान है तो गद्य वस्तविकता की ठोस भूमि पर चलना। दोनों के क्षण मानव के जीवन में आते रहते हैं। किसी अनोखे आनंद को पाकर, कुछ ऐसा जानकर जो पहले कभी जाना नहीं गया था अथवा कुछ ऐसा जानकर जो इस जगत का भी जान नहीं पड़ता, मन उस अलौकिक लोक में विचरण करता है। उस रस को व्यक्त करना गद्य में सम्भव ही नहीं है। वह इतना सूक्ष्म है कि शब्दों में भी नहीं समाता, तब कुछ परिचित शब्दों में उसे बहाया जाता है जैसे भूमि पर कोई लकीर खींच दे और बहता हुआ जल उधर की तरफ़ बह जाए। कवि केवल उस अनाम अनुभव को एक रास्ता देता है और वह जो उसके मन को घेरे हुए था, वह ऊर्जा शब्दों के रूप में बह जाती है। शब्द ऊर्जा ही तो हैं, जिनमें भावों का परिवर्तन होता है, फिर वे स्थित हो जाते हैं। गतिमय ऊर्जा स्थाई हो जाती है। दूसरी ओर जब भीतर का अनुभव स्थायी हो गया हो तो मन में वेग नहीं उठता और अब स्थायी ऊर्जा को गतिमान बनाना है तो गद्य का जन्म होता है। भीतर एक स्थिरता है, शांति है और भाव भी शांत हो गये हैं। कौतूहल अब पहले की तरह ज़मीन से उखाड़ नहीं देता आकाश में उड़ने के लिए, इसलिए शब्द थम- थम कर आते हैं।
Saturday, October 23, 2021
Monday, September 14, 2020
हिंदी दिवस पर आप सभी को शुभकामनायें
प्राकृत से अपभ्रंश और अपभ्रंश से ब्रज, अवधी व मैथिली आदि विभिन्न रूपों में परिवर्तित होती हुई हिंदी को आज हम जिस रूप में देखते हैं, उसको यहां तक पहुँचाने में हिंदी भाषा के कवियों का बहुत बड़ा योगदान है. कबीर, रैदास, सूर, मीरा, तुलसी, बिहारी, भारतेंदु हरिश्चंद्र से होती हुई हिन्दी की यह धारा मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, निराला, पन्त, महादेवी वर्मा और उनके बाद दिनकर, अज्ञेय, भवानीप्रसाद मिश्र, मुक्तिबोध, नीरज, तथा रघुबीर सहाय जैसे अनेकानेक रचनाकारों के काव्य सृजन से विकसित होती आ रही है. हिंदी कविता के इस विशाल भंडार के प्रति आज की पीढ़ी कितनी सजग है और उससे कितना ग्रहण कर सकती है इस पर ही हिंदी के भविष्य को आंका जा सकता है. आज आवश्यकता है हम अपनी साहित्यिक धरोहर का सम्मान करें, उसमें से कुछ मोती चुनें और उनकी प्रतिभा से चमत्कृत होकर अपने भीतर सुप्त पड़ी काव्य चेतना को जगाएं.