Showing posts with label चित्रकार. Show all posts
Showing posts with label चित्रकार. Show all posts

Friday, December 6, 2013

निज गरिमा में रहना सीखें

अप्रैल २००५ 
हम दुखकार हैं, जैसे चित्रकार चित्र बनाता है, कुम्भकार घट बनाता है, उसी प्रकार हम जीवन में नित नये दुखों का निर्माण करते हैं. फिर स्वयं ही सहानुभूति के पात्र बनते हैं, अपनी भी और दूसरों की भी. परमात्मा के सम्मुख जाकर दुखों से छुड़ाने के लिए प्रार्थना करते हैं, वह भी सोचता होगा, मैंने तो मानव को समर्थ बनाया है, वह अपनी शक्ति भुलाकर क्यों दुखी होता है. ईश्वर प्रेम व शांति की मूरत है, जब वह अपनी गरिमा में रह सकता है तो फिर मानव क्यों नहीं रह सकता. देह, मन, बुद्धि जो हमारे लिए साधन रूप थे, हमारी सेवा के लिए मिले थे, हमसे सेवा मांगते हैं. शुद्र, वैश्य आदि कोई जन्म से नहीं होता, जो देह को ही आत्मा मानता है, वह शुद्र है, जो मन, बुद्धि तथा अहंकार को आत्मा मानते हैं वे क्षत्रिय या वैश्य हो सकते हैं, आत्मा को ही आत्मा जानने वाला ब्राह्मण है, ब्रह्म को जानने का अधिकारी है, तथा उसके आनन्द को पा सकता है. ऐसा आनन्द जो कभी घटता-बढ़ता नहीं, जो सापेक्ष नहीं है, जो अनंत मात्रा का है, जो अनंत काल के लिए है, जिसे पाने के लिए कुछ करना नहीं पड़ता, जो हमें सहज ही प्राप्त है.