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Sunday, August 2, 2026

हर विभूति का स्रोत एक है

एक चित्रकार, लेखक, कवि या शिल्पी मूलतः सृष्टा होता है। उसके लिए कला का सृजन कर पाना ही अपने आप में मुख्य बात है, न कि उससे किसी तरह का लाभ, नाम, यश या धन कमाना। सभी कलाएँ कलाकार के माध्यम से प्रकट भर हो रही हैं, उनके पीछे प्रेरक तत्व तो एक वही है। कलाओं का सृजन एक उसी स्रोत से होता है। कृष्ण भगवद् गीता में कहते हैं, जगत में जो कुछ भी सुंदर, शक्तिशाली, ज्ञानवान या श्रेष्ठ है, वह उन्हीं का अंश है। किसी व्यक्ति में नेतृत्व क्षमता या कला सृजन की क्षमता है तो वह ईश्वर की दिव्य शक्ति का ही एक रूप है। हर किसी की योग्यता ईश्वर द्वारा दिया गया एक उपहार है। इस धारणा के अनुसार चलने से मन में समता की भावना बढ़ती है।व्यक्ति के अहंकार का नाश होता है और वह सुख-दुख के पार चला जाता है। मन में सागर की तरह ज्वार-भाटा उठते रहते हैं किंतु आत्मा सदा असंग है। मन चंद्रमा की तरह घटता-बढ़ता है पर आत्मा आकाश की तरह निरंजन है।