अगस्त २००५
सेवा
स्नेहवश होती है, वहाँ स्वयं के लिए कुछ नहीं चाहिए, चाहिये तो केवल सेव्य की
प्रसन्नता, सेवक यदि अपना सुख चाहे, अपनी रूचि को सेव्य पर लादे तो वह अपनी ही
सेवा कर रहा है. हनुमान सेवक हैं, उनके प्रेम की धारा सदा आराध्य की ओर बहती है. वह
राम की सेवा के अवसर खोजते हैं. हम लोग अपनी सुविधा देखकर सेवा करते हैं, तभी उसका
फल नहीं मिलता. सच्ची सेवा करने से अन्तःकर्ण की शुद्ध होती है, अहंकार गलता है.
सेवा हमें प्रभु के पास ले जा सकती है.