आज तक हमने जो भी किया उसका फल तो हमें मिलने ही वाला है, वह हमारा भाग्य बन गया है जो एक न एक दिन सम्मुख आएगा, किन्तु इस क्षण के बाद हम मनसा, वाचा, कर्म जो भी करने वाले हैं, वह अभी हमारे हाथ में है. हम यदि चाहें तो अपने कर्मों के प्रवाह को शुभ की तरफ मोड़ सकते हैं और अपने भाग्य को अपने अनुकूल गढ़ सकते हैं. इसमें सबसे बड़ा सहायक है भीतर का अखण्ड विश्वास और सत्य को जानने का अभिलाषा. परमात्मा परम शुभता का प्रतीक है, वह शांति, आनंद और प्रेम का अनंत सागर है, यदि हम उसका स्मरण मात्र करते हैं तो अंतर को उतनी देर के लिए उसके गुणों से भर लेते हैं. धीरे-धीरे कर्मों को करते समय भी उसका स्मरण बना रह सकता है. मन क्रोध या लोभ का शिकार नहीं होता, ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा, दिखावे की अग्नि में नहीं जलता. सदा स्वयं को औरों से बेहतर बताने की संसारी प्रवृत्ति अपने आप छूटने लगती है. मन सात्विक बल और साहस से भर जाता है और पुराने किसी कर्म का प्रतिकूल फल आने पर भी वह भीतर समता भाव बनाये रखता है. उपासना ऐसा कर्म है जो करते समय व भविष्य में भी सुख से भर देने वाला है.
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Monday, June 7, 2021
Tuesday, December 8, 2020
कर्मण्येवाधिकारस्ते
फल की कामना को रखकर किया गया कर्म अस्तित्त्व के लिए नहीं होता, जबकि साधक अस्तित्त्व के साथ अभिन्नता का अनुभव करना चाहता है. यदि उसका स्वार्थ अभी भी शेष है तो साधना का लक्ष्य अभी दूर है. जो किंचित मात्र भी मन को बचाकर रखना चाहता है, वह अहंकार का पोषण ही कर रहा है. उसे दुःख का भागी होना ही पड़ेगा. दुःख आत्मा से दूर ले जाता है, सहजता ही आनंद है. जो जैसा है उसे वैसा ही स्वीकारना तथा किसी मान की चाह या प्राप्ति के लिए कुछ करना या करने की इच्छा रखना सहजता के पद से नीचे उतर जाने जैसा ही है। जो भाव दशा मन में आती है और उतर जाती है वह नश्वर है। आकाश की भांति अनंत और सागर की भांति गहरे स्थायी भाव में टिकना ही साधना है।
Thursday, June 13, 2019
जैसे कर्म करेगा मानव
हमारे आस-पास जो भी
परिस्थितियाँ प्रकृति के द्वारा रचित हैं, वे उन्हीं कारणों के परिणाम स्वरूप हमें
मिली हैं, जिनके बीज हमने कभी डाले थे. जैसे कोई छात्र यदि पढ़ाई नहीं करता और फेल
हो जाता है तो यह उसके ही कर्म का फल है. अब उसे दुखी होने या शिकायत करने का क्या
अधिकार है. इस वक्त यदि वह दुखी होकर अपना स्वास्थ्य खराब करेगा या जीवन ही समाप्त
कर लेगा तो इस नये कर्म का परिणाम भविष्य में और दुःख के रूप में उसे मिलेगा. अज्ञानवश
स्वयं को कर्त्ता मानकर हम भविष्य के लिए कारण रूप में बीज डालते रहते हैं. जब फल
हमारी इच्छा के विपरीत आता है तो उसे स्वीकारते भी नहीं. आत्मज्ञान होने के बाद जब
कोई स्वयं को कर्त्ता मानना छोड़ देता है, तब भोक्ता भी नहीं रहता. मन, बुद्धि व
देह द्वारा जो भी कर्म पहले हुए हैं, उन्हीं का परिणाम मन, बुद्धि व देह को मिल
रहा है. आत्मा सदा अलिप्त है, यह ज्ञान ही हमें मुक्त करता है.
Monday, February 25, 2019
बुद्धियोग में टिक जाये मन
२५ फरवरी २०१९
भगवद्गीता में कृष्ण कहते
हैं, कर्म करो किन्तु फल की इच्छा मत करो. बुद्धि को समता में स्थित करके कर्म
करो. इस पर अर्जुन ने कहा, यदि बुद्धि का महत्व अधिक है तो हम कर्म ही क्यों करें, कृष्ण ने कहा क्योंकि कर्म किये बिना कोई पल भर भी नहीं रह सकता. स्वभाव के
वशीभूत होकर हर व्यक्ति कोई न कोई कर्म करता ही है, यदि वह अपने कर्म का फल भी
चाहता है तो कर्म उसके लिए बंधन बन जाता है. फल मिलने से पूर्व उसका मन समता में
स्थित नहीं रह पाता और फल यदि सुखद हुआ तो वह अपने भीतर लोभ जगाता है दुखद हुआ तो
शोक करता है. लोभ और शोक दोनों ही मन के विकार हैं. इसके विपरीत फल की इच्छा त्याग
कर कर्म करने से मन विकारों से मुक्त होता है, भीतर स्थिरता का अनुभव होता है. भक्त
सभी कर्मों को भगवान की पूजा मानकर करता है और ज्ञानी कर्ताभाव से मुक्त होकर कर्म
करता है. ज्ञानी स्वयं को आत्मा जानकर अकर्ता भाव में स्थित हो जाता है और प्रकृति
में कर्म हो रहे हैं ऐसा जानकर सदा समता में रहता है.
Wednesday, May 21, 2014
सत्य ही मंजिल वही हो मार्ग
संशय
रूपी पक्षी के दो पंख होते हैं, पहला दुष्ट तर्क दूसरा क्लिष्ट तर्क. पहले तर्क से
दूसरों को कष्ट होता है, तो दूसरे प्रकार के तर्क से हम स्वयं ही फंस जाते हैं.
निर्दोष चित्त का प्रसाद है अतर्क, भक्ति पूर्ण हो तो तर्क के लिए कोई जगह ही नहीं.
भक्ति का अर्थ है सत्य के प्रति समर्पित होना, जो सही है उसको ही चाहना, तब जीवन
में आगे बढ़ने के मार्ग अपने आप खुलते जाते हैं. किसी फल की आकांक्षा के बिना
कृतज्ञता स्वरूप तब जीवन यात्रा की जाती है तो बिना किसी बाधा के वह फलीभूत होती
है.
Monday, May 12, 2014
सहज हुए सब कर्म करें
फरवरी २००६
मिथ्या
पुरुषार्थ कर्मों को बाँधने वाला है, वास्तविक पुरुषार्थ कर्मों से हमें छुड़ाता
है. आनन्द का प्रदाता है, और यह तब होता है जब हम स्वयं को जान लेते हैं. तब बाहर
से सारे कार्य करते हुए भी हम भीतर से विरक्त ही रहते हैं. कर्तृत्व व भोक्तृत्व
तब शेष नहीं रहता. बाहर हम जो भी कर्म करते हैं वे तो फल हैं, भीतर जो भाव बनते हैं,
वे ही बाँधते हैं. हमारे भीतर के भाव ही भावी को जन्म देते हैं. आत्मा में जो
स्थित रहता है, उसके जीवन में जो भी घटता है वह सहज ही स्वीकार्य हो जाता है. उसके
भीतर कर्मों की होली जलती है और बाहर प्रेम का रंग चढ़ता है.
Thursday, March 27, 2014
कर्म का विज्ञान सिखाता
अक्तूबर २००५
हम जो भी स्थूल कर्म करते
हैं, वास्तव में वे सभी पूर्व कर्मों के परिणाम हैं, हम उनके कर्ता नहीं हैं. जो सूक्ष्म
कर्म हैं, दिखाई नहीं देते, वही बंधन का कारण होते हैं, अतः उन्हें रोकना ही कर्म
त्याग है, इस बात का ज्ञान ही समस्त दुखों से एक साथ छुटकारा पाने का उपाय है. कर्ता
होकर जब तक हम इस जगत में रहते हैं तब तक हम भोक्ता भी बने रहेंगे. तब हम जगत में
रहकर जो भी कर्म करते हैं वह अभिनय मात्र है, उस कर्म का फल वहीं का वहीं समाप्त
हो जाता है.
Tuesday, February 11, 2014
सेवा भी साधना है
अगस्त २००५
सेवा
स्नेहवश होती है, वहाँ स्वयं के लिए कुछ नहीं चाहिए, चाहिये तो केवल सेव्य की
प्रसन्नता, सेवक यदि अपना सुख चाहे, अपनी रूचि को सेव्य पर लादे तो वह अपनी ही
सेवा कर रहा है. हनुमान सेवक हैं, उनके प्रेम की धारा सदा आराध्य की ओर बहती है. वह
राम की सेवा के अवसर खोजते हैं. हम लोग अपनी सुविधा देखकर सेवा करते हैं, तभी उसका
फल नहीं मिलता. सच्ची सेवा करने से अन्तःकर्ण की शुद्ध होती है, अहंकार गलता है.
सेवा हमें प्रभु के पास ले जा सकती है.
Thursday, April 18, 2013
कर्मगति अति गहन, हे अर्जुन !
जुलाई २००४
जो कर्म वर्तमान में हम करते
हैं, वे क्रियमाण कहलाते हैं, जो कर्म बीज रूप में हमारे सूक्ष्म शरीर के साथ रहते
हैं, वे संचित कर्म कहलाते हैं और जब वे परिपक्व हो जाते हैं व फल देने का कार्य
करते हैं, तब उन्हें प्रारब्ध कर्म कहते हैं. साधना के द्वारा जब कोई साधक संचित
कर्मों के बीजों को भून देता है तब उनमें फल नहीं लगते, और साधना के रूप में नए शुभ
क्रियमाण कर्म करता है, तो नए बीज शुभ ही बो रहा है जो वक्त आने पर शुभ फल ही
देगें. भक्त अपने सभी कर्मों को समर्पण करके मुक्त हो जाता है. ज्ञानी जानता है कि
भीतर आत्मा व परमात्मा दो सखाओं की भांति विद्यमान हैं, परमात्मा द्रष्टा है,
आत्मा भोक्ता है, यदि आत्मा भी द्रष्टा भाव में आ जाये, तो जगत एक मनोहारी सुखद
कर्मक्षेत्र बन जायेगा.
Friday, August 31, 2012
भीतर जगता प्रेम अछूता
जुलाई २००३
जैसे नरभक्षी पौधे अपनी पकड़ में आये प्राणियों को अपनी डालियों में जकड़ कर उनको
विवश कर देते हैं, वैसे ही राग और द्वेष के दो वृक्ष हमारे भीतर उगे हैं, उनकी
जड़ों, टहनियों ने हमको जकड़ रखा है, हम उन्हीं में उलझे हुए हैं, और छूटने का
प्रयास भी नहीं करते. सुख-दुखके फल हमें इन्हीं वृक्षों से मिलते हैं. सदगुरु आकर
हमने जगाते हैं, उनकी आभा देखकर हमें भी वैसा बनने की प्रेरणा मिलती है. साधक का
राग खो जाता है यदि वह अपना राग ईश्वर में लगा दे, उसे द्वेष नहीं रहता क्योंकि उसके
सिवाय कुछ नजर ही नहीं आता, वह तटस्थ हो जाता है. सच्चा प्रेम तभी अंतर में जगता
है. जो सभी को अपना सा जानता है, वह सभी के कल्याण की ही बात सोचेगा. उसका हृदय
विशाल हो जाता है, छोटी-छोटी बातों से निर्लिप्त होकर वह जगत में रहता है. वह जो भी
करता है पूरे होशोहवास में करता है, ज्ञान पाने का सदा अभिलाषी रहता है. वह
पूर्णकाम होकर जगत में राजा की नाईं विचरता है पर उसमें अहंकार नहीं होता. सदगुरु
व परमात्मा का वरद हस्त सदा उसके सर पर होता है.
Wednesday, August 29, 2012
कर्म किये जा फल की चिंता मत कर ऐ इंसान
हम जैसा कर्म करते हैं
प्रकृति उसका तदनुसार फल देती है. उसके नियम अटल हैं. निष्काम कर्म भी करें तो भी फल तो मिलने ही वाला है. कामना होने
से हमारा सारा ध्यान कर्म की ओर न रहकर फल की ओर भी चला जाता है सो हमारी चेष्टा
पूर्ण नहीं होती सो फल भी अधूरा ही मिलता है. चिंतन, मनन ध्यान भी कर्म हैं और
निर्धरित कर्त्तव्यों का पालन भी. यदि पहली श्रेणी के कर्म हेतु के लिये किये गए
हों, और कर्त्तव्य, मात्र कर्त्तव्य हेतु तो पहले कर्म बांधने वाले होंगे. मन को
सात्विक बनाना भी यदि कुछ पाने की इच्छा से हुआ तो मुक्ति दूर ही रहेगी. कर्ता भाव
जब तक नहीं छूटता तब तक फल की इच्छा बनी ही रहेगी, यदि कर्म हमारे द्वारा हो रहे
हैं, हम नहीं कर रहे हैं तभी हम फल की आशा से बंधेंगे नहीं.
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