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Wednesday, January 25, 2017

सबका मंगल होए रे

२५ जनवरी २०१७ 
हम जीवन में कितने ही व्यक्तियों से मिलते हैं. जिनमें कुछ के साथ थोड़े समय के लिए कुछ के साथ देर तक हम समय बिताते हैं. विचारों का आदान-प्रदान भी होता है और वस्तुओं का भी. इससे भी सूक्ष्म एक शै है जिसका आदान-प्रदान निरंतर चलता रहता है, चाहे वह व्यक्ति सम्मुख हो या हम उसके बारे में किसी से बात कर रहे हों, या उसके बारे में कुछ सोच रहे हों. किसी के प्रति हमारी भावना केवल हम तक सीमित नहीं रह पाती, वह तत्क्षण उस तक पहुँच जाती है. स्थूल से सूक्ष्म अति शक्तिशाली है. हम शब्दों का ध्यान रख लेते हैं और भीतर क्रोध रखते हुए भी बाहर से जाहिर नहीं करते, कभी-कभी इसका विपरीत भी हो सकता है. कोई भीतर प्रेम होते हुए भी बाहर से उदासीनता व्यक्त करे, पर दोनों ही स्थितियों में सूक्ष्म तरंगों के द्वारा हमारी वास्तविक भावनाएं उसके अंतरतम तक पहुँच जाती हैं, और भविष्य में उसका व्यवहार उनसे भी प्रभावित होगा. इसीलिए संत कहते हैं सदा हृदय से सबके लिए मंगल कामना करते रहें. 

Tuesday, March 3, 2015

मिट कर ही मंजिल मिलती है

फरवरी २००८ 
अगर बीज अपने को बचाए तो बचता नहीं और मिटाए तो अमर हो जाता है. जो मिटेगा वही बचेगा, जो बचाएगा वह मिट जाता है. जिस दिन यह ‘मैं’ जान लेता है, मेरे होने में ही बंधन है उस दिन यह मन को सूक्ष्म करने की क्रिया आरम्भ करता है. यह ‘मैं’ का पर्दा मखमल से मलमल का करना है, जिस दिन यह मन पूरा मिट जाता है उस दिन परमात्मा ही बचता है. अभी तो मोटा लोहे का पर्दा है मन, जिस दिन ‘मैं’ नहीं रहता उस दिन वह महा अतिथि आता है. अभी मन खाली नहीं है, भीतर कोलाहल है, इसे शांत करके ही मन महीन किया जा सकता है. सूक्ष्म करते करते शून्य की यात्रा शुरू करनी है जो पूर्ण पर समाप्त होती है. हमारे भीतर सूक्ष्म भी है स्थूल भी. देह बर्फ जैसी है, मन पानी जैसा, आत्मा भाप जैसी है. जो स्वयं को देह मानता है वह मृत्यु से डरेगा. जो स्वयं को मन मानता है वह काव्य, संगीत तथा कला में रूचि रखता है और जो स्वयं को आत्मा मानता है वह सर्वव्याप्त है, वह उड़ान भर सकता है. वह मुक्त है. वह नष्ट नहीं हो सकता. वह सूक्ष्म है, जो जितना सूक्ष्म है उतना ही शक्तिशाली होता जायेगा. वह चट्टान सा दृढ़ भी होगा और फूल से भी कोमल. वह होकर भी नहीं होगा और उसके सिवा भी कुछ होगा भी नहीं, सारे द्वंद्व उसमें आकर मिट जायेंगे. वह होने के लिए कुछ करना नहीं है. वह तो है ही, केवल उसे जानना भर है. मन को खाली करना ऐसा तो नहीं है कि कोई बर्तन ख़ाली करना हो. कामना को त्यागते ही या समर्पण करते ही मन ठहर जाता है, ठहरा हुआ मन ही ख़ाली मन है !


Friday, December 5, 2014

मन भीजे जब रस पावन में

जून २००७ 
हमें स्थूल से सूक्ष्म की ओर जाना है, जहाँ कोई भेद नहीं है, वहाँ अद्वैत है. स्थूल में भेद है, वहाँ सारे विकार हैं. सूक्ष्म निर्विकार है, वह सारे दुखों से परे है. उस सूक्ष्म को पाना हो तो पहले तन रूपी घट को तपना होगा, मन रूपी दूध को जमाना होगा तब आत्मा रूपी नवनीत प्रकट होगा. तन से निष्काम कर्म, मन से समता को जो साध ले वही आत्मा को जान सकता है. अहंकार ही हमें आत्मा से दूर रखता है. अहंकार भीतर के रस को सुखा देता है. मात्र बौद्धिक ज्ञान कब तक हृदय को हर-भरा रखेगा, उसे तो भक्ति का पावन जल चाहिए. आत्मा का आनंद भक्ति के सहारे मिल सकता है. जिसकी प्रज्ञा जगे तो विनम्रता आ ही जाती है.  

Thursday, March 27, 2014

कर्म का विज्ञान सिखाता

अक्तूबर २००५ 
हम जो भी स्थूल कर्म करते हैं, वास्तव में वे सभी पूर्व कर्मों के परिणाम हैं, हम उनके कर्ता नहीं हैं. जो सूक्ष्म कर्म हैं, दिखाई नहीं देते, वही बंधन का कारण होते हैं, अतः उन्हें रोकना ही कर्म त्याग है, इस बात का ज्ञान ही समस्त दुखों से एक साथ छुटकारा पाने का उपाय है. कर्ता होकर जब तक हम इस जगत में रहते हैं तब तक हम भोक्ता भी बने रहेंगे. तब हम जगत में रहकर जो भी कर्म करते हैं वह अभिनय मात्र है, उस कर्म का फल वहीं का वहीं समाप्त हो जाता है.  

Monday, July 4, 2011

जड़ व चेतन


अगस्त २००० 
जब हम स्थूल का चिन्तन करते हैं तो बुद्धि भी जड़ हो जाती है, प्रमाद मन की जड़ता है, यह वह स्थिति है जब मन परम चेतन के प्रति उदासीन है. सूक्ष्म का चिन्तन करने से बुद्धि चेतन होती है. जगत का चिंतन स्थूल है और जगदीश का सूक्ष्म. जैसे जब पानी वाष्पीकृत होता है तो उसकी शक्ति बढ़ जाती है, जमने पर घट जाती है. हम सारा जीवन एक आयाम को देखते –देखते ही बिता देते हैं, दूसरे आयाम की ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता. परिधि पर ही रह जाते हैं, अपने केन्द्र को छू नहीं पाते. तभी जीवन में एक अधूरेपन का अनुभव होता है, पूर्णता की चाह बनी रहती है. अपनी पूरी ऊर्जा व ऊष्मा को पाने का अर्थ है चेतन बने रहना. एक सरिता की तरह सातत्य रूप से गतिमान रहना. स्फूर्तिवान होकर मन में नैसर्गिक व सद्कार्यों के प्रति सदप्रवृत्ति जगे रहना.