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Wednesday, January 25, 2017

सबका मंगल होए रे

२५ जनवरी २०१७ 
हम जीवन में कितने ही व्यक्तियों से मिलते हैं. जिनमें कुछ के साथ थोड़े समय के लिए कुछ के साथ देर तक हम समय बिताते हैं. विचारों का आदान-प्रदान भी होता है और वस्तुओं का भी. इससे भी सूक्ष्म एक शै है जिसका आदान-प्रदान निरंतर चलता रहता है, चाहे वह व्यक्ति सम्मुख हो या हम उसके बारे में किसी से बात कर रहे हों, या उसके बारे में कुछ सोच रहे हों. किसी के प्रति हमारी भावना केवल हम तक सीमित नहीं रह पाती, वह तत्क्षण उस तक पहुँच जाती है. स्थूल से सूक्ष्म अति शक्तिशाली है. हम शब्दों का ध्यान रख लेते हैं और भीतर क्रोध रखते हुए भी बाहर से जाहिर नहीं करते, कभी-कभी इसका विपरीत भी हो सकता है. कोई भीतर प्रेम होते हुए भी बाहर से उदासीनता व्यक्त करे, पर दोनों ही स्थितियों में सूक्ष्म तरंगों के द्वारा हमारी वास्तविक भावनाएं उसके अंतरतम तक पहुँच जाती हैं, और भविष्य में उसका व्यवहार उनसे भी प्रभावित होगा. इसीलिए संत कहते हैं सदा हृदय से सबके लिए मंगल कामना करते रहें. 

Thursday, September 26, 2013

सुख-दुःख स्वयं जगाता है मन

मार्च २००५ 
ज्यादातर समय हमारा मन अतीत व भविष्य की उधेड़बुन में लगा रहता है, संतजन कहते हैं जो मन को साक्षी भाव से देख सकता है, उसके मन में स्थिरता आती है. शरीर की संवेदनाओं के प्रति सजग होते होते साधक को पता चलता है की स्थूलपना खत्म होता जा रहा है, तरंगे बनती हैं फिर खत्म होती हैं. क्रोध, लोभ आदि विकार भी स्थायी नहीं हैं, शरीर, मन, बुद्धि सभी बदल रहे हैं. कान में ध्वनि तरंग पड़ते ही भीतर भी एक तरंग उठती है. आंख में जब देखते हैं तो भीतर एक तरंग उठती है. यदि दृश्य सुखद हुआ तो मन उसे पसंद करने की तरंग जगाता  है, यदि दुखद हुआ तो दुखद संवेदनाएं जगाता है. ऊपर से लगता है हम दुखद या सुखद घटना के प्रति प्रतिक्रिया जगाते हैं पर वास्तव में संवेदनाओं के प्रति ही प्रतिक्रिया करते हैं. गहराई में जाकर हम देखते हैं कि दुःख या सुख हम अपनी प्रतिक्रियाओं के कारण ही अनुभव करते हैं, जब हम यह देखते हैं की ये संवेदनाएं क्षणभंगुर हैं तो हम राग-द्वेष से मुक्त होने लगते हैं. हम जानने लगते हैं कि विकार जगते ही मन की शांति भंग होती है, तब हम विकार से मुक्त होने लगते हैं. 

Tuesday, November 22, 2011

तप और समर्पण


जुलाई २००२ 

जीवन में यदि कोई दुःख हो तो समता भाव बनाये रखकर सहने से उसे तप बनाया जा सकता है. ऐसा तप हमारे पिछले कर्मों को काटता है. मन में निखार लाता है, कमजोरियां निकलती हैं. सेवा के द्वारा भी दुःख को काटा जा सकता है तथा सत्संग के द्वारा भी. किन्तु भविष्य में दुःख न आये इसका ध्यान भी सदा रखना है. वह पूर्ण समर्पण से ही संभव है. ज्ञान रूपी साबुन से अपने मन का वस्त्र धोना है पर इसके पूर्व ईश्वर के प्रेम रूपी जल में उसे भिगोना भी तो पड़ेगा. प्रेम व ज्ञान दोनों का सामंजस्य होगा तो हृदय में शांति की तरंग उठेगी और मस्तिष्क ज्ञान में स्थिर रहेगा.  

Wednesday, July 27, 2011

भीतर-बाहर


अहंकार रूपी पवन हमारी मन रूपी तरंग को संसार सागर के तट से टकराती रहती है. जो हम इस दुनिया को बांटते हैं, वही हमें वापस मिलता है. सारा ब्रह्मांड एक प्रतिबिम्ब है एक प्रतिध्वनि है. हम जैसा दिखाना चाहते हैं, देखना चाहते हैं, वही हमें दिखाई पड़ता है. जो कुछ बाहर है वही भीतर है और जो कुछ भीतर है वही बाहर है. बाहर की सच्चाई को हम बुद्धि के स्तर पर समझ सकते हैं पर भीतर के सत्य को अनुभूति के स्तर पर समझना होगा. प्रतिपल अंतर को साक्षी भाव से देखने की कला विकसित करनी है. जो भी स्फुरणा जगे उसके प्रति सजग होकर संवेदना को देखना है. धीरे धीरे संवेदना शांत होती जाती है और स्फुरणा भी शांत होती जाती है. 

Friday, July 1, 2011

मन और आत्मा


जुलाई २००० 

जैसे तरंग सागर में है और सागर तरंग में है, वैसे ही हमारा मन आत्मा में और आत्मा मन में है. यदि यह स्मरण सदा बना रहे बल्कि अपना अनुभव हो जाये तो हम व्यर्थ की चेष्टाओं से बचे रहेंगे, अपने सामर्थ्य व शक्ति का सही उपयोग हम कर सकेंगे. अभी तो हमारा बहुत सा वक्त पानी को कूटने जैसी व्यर्थ क्रियाओं में चला जाता है. अपने मन की चाबी व्यक्ति, वस्तु तथा परिस्थिति को सौंप कर हमने स्वयं ही परतंत्रता मोल ले ली है, जबकि हमारा सत्य स्वरूप शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सद चित आनंद है.