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Sunday, March 16, 2014

बुरा जो देखन मैं चला

अक्तूबर २००५ 
भीतर प्रेम भरा हो तो सारा जगत ही प्रेममय लगता है, कितना सच कहते हैं शास्त्र और संतजन, हमारे भीतर ही वह प्रेम का खजाना है, शांति और आनन्द का खजाना है. हमारे हाथ जब उसकी चाबी लग जाती है तो जीवन धन्य हो जाता है. उस चाबी की तलाश में ही कोई लग जाये तो उसका जीवन अर्थवान हो जाता है, हमें संतजन ही बताते हैं कि वह चाबी कहाँ मिलेगी, कैसे मिलेगी ? लेकिन उसे खोजने की इच्छा हमारे भीतर जगे ऐसी परिस्थितियाँ ईश्वर हमारे जीवन में उत्पन्न करते हैं. ईश्वर और संतजनों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए हमें विनम्रता के साथ ज्ञान को धारण करना होगा. अन्यों के दोष देखने लगे तो हमारा अभिमान रूपी दोष ही दिखाई देता है. ईश्वर हमें इन सारे दोषों से बचाना चाहता है इसलिए वह हमें वे दोष दिखाता है न कि स्वयं को विशिष्ट समझने के लिए. प्रभु कितना दयालु है !  

Friday, July 1, 2011

मन और आत्मा


जुलाई २००० 

जैसे तरंग सागर में है और सागर तरंग में है, वैसे ही हमारा मन आत्मा में और आत्मा मन में है. यदि यह स्मरण सदा बना रहे बल्कि अपना अनुभव हो जाये तो हम व्यर्थ की चेष्टाओं से बचे रहेंगे, अपने सामर्थ्य व शक्ति का सही उपयोग हम कर सकेंगे. अभी तो हमारा बहुत सा वक्त पानी को कूटने जैसी व्यर्थ क्रियाओं में चला जाता है. अपने मन की चाबी व्यक्ति, वस्तु तथा परिस्थिति को सौंप कर हमने स्वयं ही परतंत्रता मोल ले ली है, जबकि हमारा सत्य स्वरूप शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सद चित आनंद है.  

Thursday, June 23, 2011

ज्ञान



जून २००० 
हमारे भीतर ज्ञान का अटूट खजाना भरा है. जिसकी चाबी खोजने का हम प्रयास ही नहीं करते, इस चाबी को हमने ही खोया है और इसे पाने की सामर्थ्य भी हममें मौजूद है. ज्ञान अनादि व अनंत है, विचार उदय होता है और अस्त होता है, पर ज्ञान शाश्वत है. ऐसे ज्ञान को पाना ही मानव जीवन का ध्येय होना चाहिए. ऐसा ज्ञान अंतर्मन में छिपे गुणों को उभारता है. सहजता, निर्मलता, अक्रोध, निरहंकारिता आदि सदगुण तथा अन्य सभी गुण जो हमें पवित्र बनाते हैं, स्वयं के साथ साथ तब हम जग को भी उनकी सुगंध से भर सकते हैं. हमारी सम्भावनाएं असीम हैं.