Friday, February 8, 2013

दो में रुकना ही दुःख है


मार्च २००४
ईश्वर निर्विरोध सत् है, इस जगत में दिखाई पड़ने वाली वस्तुएं किसी न किसी का विरोध करती हैं. जो ‘यह’ है वह ‘वह’ नहीं है, कपड़ा, लकड़ी नहीं है, किताब, कलम नहीं है, पर ईश्वर का किसी से विरोध नहीं, वह ‘यह’ भी है और ‘वह’ भी. प्रेम, घृणा नहीं है, लोभ, उदारता नहीं है, पर ईश्वर एक साथ दयालु और न्यायकारी है. कोमल और कठोर है. वह सारे द्वन्द्वों से अतीत है, पर उसमें कुछ भी होने का अभिमान नहीं है, चैतन्य निरहंकार है, इसीलिए ऐसा भी कह सकते हैं कि वह न ‘यह’ है न ‘वह’ है. वह जहाँ है वहाँ भले-बुरे में भी कोई भेद नहीं रह जाता, वहाँ बस चीजें होती हैं, जो जैसा है बस वैसा ही. साधक का लक्ष्य उसी दृष्टि को पाना है, जहाँ अद्वैत है, केवल उसी पल में मन निर्विचार हो जाता है, निर्द्वन्द्व हो पाता है. एक आह्लादपूर्ण ज्योति से भर जाता है, संशय गिर जाते हैं. तब कल्याण करना नहीं पड़ता, जो होता है, वह कल्याणकारी होता है. जीवन सहज उत्सव बन जाता है.

अगम प्रेम का पथ है यह


‘स्व’ से ‘पर’ की ओर जाने का नाम ही संसार है और ‘पर’ से ‘स्व’ की ओर जाने का नाम ही अध्यात्म है. यह संसार पाया नहीं जा सकता और परमात्मा को खोया नहीं जा सकता. जिसको पाने का कोई उपाय नहीं उसे हम पाया हुआ समझते हैं और जिसे खोने का कोई उपाय नहीं उसे जीवन भर पाने का प्रयास करते है. संसारी कुछ बनना चाहता है, पर संत, भक्त मिटना चाहता है. प्रेम का पथ अगम है, इसमें प्रियतम तो याद रहता है पर खुद की याद नहीं रहती.

Thursday, February 7, 2013

मन वैरागी हो जाये तो


वैराग्य का अर्थ जगत से भागना नहीं है, बल्कि वस्तुओं, व्यक्तियों और परिस्थितियों में स्वयं को न उलझाना, जैसे हम गुलाब की झाड़ी के पास अथवा जंगल में स्वयं को बचाकर चलते हैं, वैसे ही जगत में न किसी के अहंकार को ठेस पहुंचा कर न स्वयं को दूसरों के द्वारा पीड़ित होकर चलने का अभ्यास ही वैराग्य है. ऐसा व्यक्ति ही सच्चा प्रेम कर सकता है, क्योंकि उसकी ऊर्जा उसके भीतर ही है, वह किसी से कोई अपेक्षा नहीं रखता. सहज भाव से वह अपने कर्मों को किये चले जाता है. सुख पाने की लालसा, प्रेम पाने की आकांक्षा उसे कहीं बाँधती नहीं है. वह उस मधुमक्खी की तरह है जो अपने पंखों को बचा कर मधुपान करती है न कि उस मक्खी की तरह जो अपने पंखों सहित शहद में जा फंसती है. जिसे न मान की इच्छा है न अपमान का भय वही सही मायनों में मुक्त है. मोह हमें बांधता है, वह सदा नीचे की ओर ले जाता है, प्रेम सदा ऊपर की और ले जाता है, वह हल्का है. हमें साधना के पथ पर स्वयं को खाली और हल्का करते जाना है. तभी ईश्वर बाँसुरी की फूंक हमारे भीतर भर सकता है, हमारी आत्मा का संगीत तभी हमें सुनाई देता है.

Tuesday, February 5, 2013

प्राणशक्ति सबल करनी है


फरवरी २००४ 
हमें यदि आत्मानुशासन का विकास करना है तो सर्वप्रथम प्राणशक्ति का विकास करना होगा. इन्द्रियों का स्वामी मन है, मन का स्वामी प्राण है, प्राणशक्ति यदि सबल नहीं है तो मन बिखरा-बिखरा सा रहेगा. संतुलित भोजन, प्राणायाम, व्यायाम, समुचित नींद तथा स्वाध्याय भी प्राणशक्ति को बढ़ाने के लिए आवश्यक हैं. प्राण से आगे भाव जगत है, जिससे आगे हमारा सूक्ष्म शरीर है, उससे भी आगे सूक्ष्मतर शरीर, जहाँ हम सूक्ष्म स्पन्दनों का अनुभव करते हैं, तब मन ठहर जाता है. इच्छा शक्ति, ज्ञान शक्ति तथा क्रिया शक्ति हमारे भीतर तभी समर्थ होती है. एक तृप्ति तथा सहजता तब जीवन का अंग बन जाती है.

Monday, February 4, 2013

खाला का घर नाहीं


फरवरी २००४ 
हम कितने विवश हैं अपने ही मन के द्वारा, हमारी जीवन शैली कितनी दुखद है, हिंसात्मक है, हम अपने को ही चोट पहुंचाते हैं, स्वयं को ही छलते हैं, और स्वयं ही पीड़ित होते हैं. हमारा झूठा अहंकार जिसे हम बड़े प्यार से पालते हैं, हमें ही डंसता है, और हम उसके दंश को सहने के सिवा कुछ नहीं कर पाते. क्यों ओढ़ी है हमने पाखंड की यह चादर, क्यों नहीं हम इसे उतार कर मुक्त नहीं हो जाते, क्यों नहीं फूलों की तरह हँसते और झरनों की तरह खिलखिलाते, क्यों हमारा होना भर ही हमारे लिए पर्याप्त नहीं होता, क्यों हम कुछ न कुछ होना चाहते हैं, क्यों नहीं हम शून्य हो जाते ताकि किसी के पीछे लगकर उसे मान दे सकें, क्यों अपने को कुछ न कुछ होने के भ्रम में फंसाए ही रखते हैं और जब कुछ नहीं हो पाते तो स्वयं तथा दूसरों को दुःख देते हैं क्यों हम अपनी बुद्धि (तथाकथित) तथा ज्ञान(अधूरा ज्ञान) से मुक्ति पा जाते और निर्दोष भाव से उस परम की शरण में चले जाते, जो हमें पुकार ही रहा है. हम उन न दिखाई देने वाली रस्सियों से बंधे हैं, जो हमें हर तरफ खींच रही हैं, हमारा दम घुटता है, हम छटपटाते हैं, इसी पीड़ा में से संभवतः कोई हल छिपा हुआ निकले. यह घुटन अब हमें अपने आप से दूर नहीं ले जा सकती. हमें शरण में आकर अपने अहं की बलि देनी होगी. कबीर ने ठीक ही कहा है, जो शीश कटाने को तैयार हो वही इस मार्ग पर आगे बढ़ सकता है.  

Sunday, February 3, 2013

सभी समाया है शून्य में


हमारे दुःख का कारण अज्ञान है. इस जगत की कोई वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति हमें सुखी-दुखी नहीं कर सकती यदि हम ज्ञान में स्थित हैं. तब हम मन की गुलामी से मुक्त हो जाते हैं, मन ही हमें भटकाता है, क्षुब्ध करता है. अपनी इच्छा पूरी न होने पर दुःख व्यक्त करता है, अन्यों को भी दुखी करता है. ऐसा वह सोचता है, जबकि अन्य भी सुखी या दुखी अज्ञान के कारण ही होते हैं, लेकिन जानते नहीं हैं. अभी बुद्धि मन की गुलाम है ज्ञान होने पर मन बुद्धि के शासन में रहेगा. आत्मा की निकटतम पड़ोसी बुद्धि है, धीरे-धीरे जब बुद्धि प्रखर होगी तो आत्मा की झलक उसमें मिलेगी. और उस क्षण सारे संशय नष्ट हो जाते हैं, हमारी निज की कल्पनाएँ भी चूर-चूर हो जाती हैं, तब पहली बार सही अर्थों में मुक्ति का अहसास होता है. मुक्ति अर्थात मन में शासन से मुक्त होना, वास्तव में मन कुछ है ही नहीं, परत दर परत हटाते जाएँ तो नीचे कुछ भी दिखाई नहीं देता. जो शून्य है वही अस्तित्त्व है, वही परम शांति है, वही प्रेम है ऐसा प्रेम जो बांधता नहीं है. तब जगत की निस्सारता का अनुभव होता है. वह जगत जो हम अपने मन में ही रचते हैं. हमारे मन में स्वयं का रचा हुआ संसार है जो बाहर के जगत का हमारा स्वयं का संस्करण है. अपने जीवन की पुस्तक हम स्वयं लिखते हैं और उसे सुखद या दुखद बनाने का दायित्व नितांत हमारा ही है.

Friday, February 1, 2013

देह से विदेह तक


हमारी आत्मा के उद्घाटन के लिए ही साधना के पथ पर संत हमें ले जाते हैं. उनके निर्देशन में हम पग-पग कदम बढ़ाते हुए अपने लक्ष्य तक पहुंचते हैं. लक्ष्य यदि स्पष्ट हो और मार्गदर्शक साथ हो तो हर कोई उसे पा सकता है. हमारे अस्तित्त्व की सात परतें हैं-शरीर,   श्वास,      मन,     बुद्धि,      चित्त,     अहंकार व     आत्मा. मानव जन्म को हम तब सफल मान सकते हैं जब शरीर से आत्मा तक पहुंचें. आत्मा के नैसर्गिक गुण हैं- प्रेम, आनंद, सुख, शांति, शक्ति, ज्ञान और पवित्रता. तब वीतरागता, दया, करुणा आदि सहज ही भीतर होते हैं और हम अन्याय कर ही नहीं सकते., हम समाज के लिए उपयोगी हो सकते हैं. आगे बढ़ सकते हैं जहाँ भावधाराएँ उत्पन्न होती हैं. हाइपोथैलेमस यदि सक्रिय है तभी हृदय का होना सार्थक है, ध्यान से यह सहज ही होता है. यह अंतरिक्ष शब्दों से भरा है पर ज्यादातर शब्द व्यर्थ ही हैं. ऐसे शब्द जो हमारे भावों को उच्चता के लिए प्रेरित करें वही सार्थक हैं, और तभी हमारे मुख से निकले शब्द भी सार्थक होंगे जब वे बिना राग-द्वेष के बोले गए हों. यदि मानसिक, वाचिक तथा कार्मिक कृत्यों के प्रति हम सजग हों तभी ऐसा हो सकता है. हमारा ऐसा मन जो किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं है, तथा ऐसी बुद्धि जो निष्काम कर्म करने का संदेश दे, आत्मा में ले जाते हैं, तब मन अमन में ठहर जाता है और बुद्धि प्रज्ञा में बदल जाती है. तब मन दाता हो जाता है, सुख चाहिए का उसका राग स्वतः शांत हो जाता है, ऐसे मन में कैसा भय और कैसा संकोच, वह मन सिर्फ प्रेम ही कर सकता है. आनंद ही बाँट सकता है.