मार्च २००४
ईश्वर निर्विरोध सत् है, इस जगत
में दिखाई पड़ने वाली वस्तुएं किसी न किसी का विरोध करती हैं. जो ‘यह’ है वह ‘वह’
नहीं है, कपड़ा, लकड़ी नहीं है, किताब, कलम नहीं है, पर ईश्वर का किसी से विरोध नहीं,
वह ‘यह’ भी है और ‘वह’ भी. प्रेम, घृणा नहीं है, लोभ, उदारता नहीं है, पर ईश्वर एक
साथ दयालु और न्यायकारी है. कोमल और कठोर है. वह सारे द्वन्द्वों से अतीत है, पर उसमें
कुछ भी होने का अभिमान नहीं है, चैतन्य निरहंकार है, इसीलिए ऐसा भी कह सकते हैं कि
वह न ‘यह’ है न ‘वह’ है. वह जहाँ है वहाँ भले-बुरे में भी कोई भेद नहीं रह जाता,
वहाँ बस चीजें होती हैं, जो जैसा है बस वैसा ही. साधक का लक्ष्य उसी दृष्टि को
पाना है, जहाँ अद्वैत है, केवल उसी पल में मन निर्विचार हो जाता है, निर्द्वन्द्व
हो पाता है. एक आह्लादपूर्ण ज्योति से भर जाता है, संशय गिर जाते हैं. तब कल्याण
करना नहीं पड़ता, जो होता है, वह कल्याणकारी होता है. जीवन सहज उत्सव बन जाता है.