Thursday, July 31, 2014

एक मार्ग पर बढ़ते जाएँ

जनवरी २००७ 
जिसे इच्छा होती है, सुख-दुःख का अनुभव होता है, जो द्वेष करता है और सदा कुछ न कुछ पाने, करने या जानने के लिए प्रयत्नशील है वही मन है. जिसे कुछ पाना नहीं, जानना नहीं जो द्वेष से मुक्त है और सुख-दुःख से असंग है वही आत्मा है. परमात्मा को अपना मानकर जब भक्त उनका स्मरण करता है तो वह सदा योग में बना रहता है वह भी असंग रहता है. ध्यान के द्वारा साधक भी कर्ता भाव से मुक्त हो जाता है. प्रेम या ध्यान दोनों में से एक मार्ग तो चुनना ही होगा. किसी भी मार्ग के द्वारा जब मन सजग हो जाता है तो स्वयं को मुक्त करने का मार्ग उसे मिल जाता है. 

Tuesday, July 29, 2014

पल पल उसकी याद रहे

जनवरी २००७ 
सन्त कहते हैं, सृष्टि और परमात्मा अलग-अलग नहीं हैं. परमात्मा हमारे भीतर उसी तरह समाया हुआ है जैसे फूल में खुशबू ! हमारे भीतर जब उसकी उपस्थिति महसूस होने लगती है तब ज्ञान केवल शब्दों तक सीमित नहीं रह जाता. साधक को प्रतीत होता है उसे अपने लिए अब कुछ पाना नहीं, कुछ करना नहीं, कुछ जानना नहीं. वह कृत-कृतव्य, ज्ञात-ज्ञातव्य, प्राप्त-प्राप्तव्य हो जाता है. हमारे जीवन का प्रत्येक क्षण जगत के लिए सुखकर हो, शुभ हो, वाणी सौम्य हो तथा कर्म बंधनकारी न हों, पूर्वजों को सुख देने वाले हों तथा प्रियजनों के लिए हितकारी हों, हमारी हर श्वास नाम से युक्त हो, पवित्र आत्मा में सदा हमारी स्थिति हो, ऐसी ही प्रार्थना जब फलित होती है तब परमात्मा की अनुभूति घटती है. 

Monday, July 28, 2014

बहे ध्यान की धारा अविरल

दिसम्बर २००६ 
जब मन ध्यानस्थ होता है तो सहज स्वाभाविक प्रसन्नता तथा उजास चेहरे पर स्वयमेव छाये रहते हैं, उनके लिए प्रयास नहीं करना पड़ता. मन से सभी के लिए सद्-भावनाएँ उपजती हैं. यह दुनिया तब पहेली नहीं लगती न ही कोई भय रहता है. ध्यान से उत्पन्न शांति सामर्थ्य जगाती है और सारे कार्य थोड़े से ही प्रयास से होने लगते हैं. कर्त्तव्य पालन यदि समुचित हो तो अंतर्मन में एक अनिवर्चनीय अनुभूति होती है, ऐसा सुख जो निर्झर की तरह अंतर्मन की धरती से अपने आप फूटता है, सभी कुछ भिगोता जाता है, जीवन एक सहज सी क्रिया बन जाता है कहीं कोई संशय नहीं रह जाता.


Saturday, July 26, 2014

जिन्दगी एक नाटक है

नवम्बर २००६ 
सजगता यह सिखाती है कि हम कितने नाटक करते हैं, यह जीवन एक नाटक ही तो है, हम सहज होते ही कब हैं. सहज होकर जीना जिसको आ गया वह तर गया. सहज समाधि उसकी लग गयी. पर हमें कई बार विवश होकर नाटक करना पड़ता है, पर जो यह जानता ही नहीं कि वह नाटक कर रहा है, वह किस अँधेरे में जी रहा है. जो जानता है वह मुक्त है. इस मुक्ति का आनंद अपरिमित है, कभी-कभी हम नाटक को असलियत समझ बैठते हैं तब फंस जाते हैं, पर द्रष्टा भाव में आते ही सब नष्ट हो जाता है. कभी जब कोई कुछ न कर रहा हो, बस चुपचाप बैठा हो, भीतर चल रही हलचल को देखता रहे तो धीरे-धीरे सब शांत हो जाता है, अडोल, ध्यानस्थ और तब मन में सजगता जगती है. 

Friday, July 25, 2014

बार बार पथ पर आना है

नवम्बर २००६ 
पुनःपुनः साधक पथ से विलग होता है तथा पुनःपुनः संतों व शास्त्रों के पावन वचन पथ पर ले आते हैं. तब वह नये विश्वास के साथ अज्ञात की ओर चल पड़ता है. एक दिन वह परमशक्ति अपना अनुभव भी कराती है. वह जीवनदायिनी शक्ति इस सृष्टि में कितने-कितने रूपों में, कितने नामों से प्रकट हो रही है. वह कहीं दिखती नहीं, जगत दिखता है, मन दिखता है, विचार तथा भावनाएं दिखती हैं पर वे जिस स्रोत से प्रकटे हैं वह नहीं दिखता. ध्यान में हम उसी में स्थित होते हैं और धीरे धीरे जब सजगता बढ़ती जाती है, ध्यान जीवन में उतरने लगता है, और वह ऊर्जा हर पल साथ ही महसूस होने लगतीं है. 

Wednesday, July 23, 2014

अति मीठी है कथा प्रभु की

नवम्बर २००६ 
भगवद कथा हमारे मन में जाकर हमें हमारे स्वभाव की ओर लौटा ले जाती है. यह तारक है, रोम-रोम को रसपूर्ण कर देती है. आनंद की ऐसी वर्षा करती है कि हृदय भीतर तक भीग जाता है. भीतर जो आनन्द का सृजन करे वह कथा ही तो है, शब्दों के रूप में उसी की प्रतिमा है. कथा से हमें कितना कुछ मिलता है, ज्ञान, भक्ति, प्रेम, रस, प्रेरणा और जीने को सही ढंग से जीने की कला भी भगवद कथा सिखाती है. 

Tuesday, July 22, 2014

एक सरस मुस्कान है भीतर

अक्तूबर २००६ 
संतजन कहते हैं, मानव जीवन पाकर भी जो भीतर की मुस्कान को जागृत नहीं कर सका वह पूर्ण जीया ही नहीं और वह धर्म भी धर्म नहीं जो सहज, मुक्त रूप से हमें हँसना नहीं सिखा देता. सहजता आती है जब कोई अपने कर्त्तव्यों का ठीक से निर्वाह कर सके. हमारा वास्तविक कर्त्तव्य क्या है, धर्म क्या है, यह गुरु ही हमें बताते हैं. शील, सत्य और स्नेह के गुणों के आधार पर भीतर की शक्ति को जागृत करने से ही कर्त्तव्य निबाहे जा सकते हैं. हमरा लक्ष्य स्पष्ट हो और ऐसा हो कि सत्य के निकट पहुंच सकें. सरल हृदय में ही धर्म निवास करता है. किसी तरह के कृत्रिम आवरण में हमें स्वयं को ढकना नहीं है, मृदुता को अपनाना है. विनम्रता को खोते ही हमारी चेतना विनाश की ओर चली जाती है. हम स्वयं को अभिव्यक्त कर सकें, अपने भीतर छिपी असंख्य शक्तियों को उजागर कर सकें. तभी हमारा इस जगत में आना सार्थक होगा और तभी भीतर की अमित मुस्कान पनपती है.