Sunday, July 14, 2013

सृष्टि रंगमंच है अद्भुत

घने अंधकार के बाद ही प्रातः की सुनहरी आभा क्षितिज पर चमकती है, भीतर जब कसक और कचोट हद से ज्यादा बढ़ जाती है, और उथल-पुथल इतनी अधिक हो जाती है की पोर-पोर उसकी पीड़ा से कराह उठता है, आत्मा जब अज्ञान के कुहासे में कहीं खो जाती है. मन पर चोट लगती है और प्राण भी सिहर उठते हैं, तब इन सारे उपद्रवों के बाद ही शांति का अनुभव एक बार पुनः हमारे विश्वास को दृढ करता है. यह सारा ड्रामा क्योंकि हमारा ही किया हुआ होता है तो हमें ही इसका पटाक्षेप करना है. हम जब अपनी अपनी वास्तविकता को भुला बैठते हैं माया के जाल में फंस जाते हैं तब ही अज्ञान अपनी भुजाओं से हमें जकड़ लेता है, हम भी यह लीला ही करते हैं एक नाटक, पर कितना वास्तविक लगता है, मुक्ति की आकांक्षा ही हमें इस बंधन से मुक्त होने को विवश करती है. हम प्रकृति के इस खेल में एक अनाड़ी खिलाड़ी की तरह उतरते हैं, पर सद्गुरु के वचनों की स्मृति हमें दक्ष होने के लिए विवश करती है, हमें सदा प्रसन्न रहने, बालवत् रहने तथा सहज रहने का सुझाव देने वाले सद्गुरु यह पल भर भी नहीं चाहते कि कोई पीड़ा में रहे, वह भी अज्ञान जनित पीड़ा में, लेकिन हमें पाठ सिखाने के लिए प्रकृति ऐसी घटनाओं को होने देती है, तब हम सचेत होते हैं, भीतर के विकारों को देख पाते हैं. अपने कर्मों की प्रकृति को जांचते हैं. हमारे कर्म ही पीड़ा का फल लाते हैं और कर्म ही सुख का. कोई कर्म करते समय यदि हम सहज नहीं रहते तो परिणाम भी ठीक नहीं होगा, प्रकृति यही सिखाती है.     

7 comments:

  1. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार१६ /७ /१३ को चर्चामंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहां स्वागत है

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    1. राजेश जी, बहुत बहुत आभार!

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  2. हमें पाठ सिखाने के लिए प्रकृति ऐसी घटनाओं को होने देती है, तब हम सचेत होते हैं,
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  3. बहुत सुन्दर विवेचन .कर्म प्रधान सृष्टि है .कर्तम सो भोगतम।मेरे कर्म ही मेरा भाग्य लिखते हैं .

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  4. धीरेन्द्र जी व वीरू भाई, स्वागत व आभार!

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  5. सार्थक प्रस्तुति
    बहुत सुंदर

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  6. मुक्ति की आकांक्षा ही हमें इस बंधन से मुक्त होने को विवश करती है.

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