Monday, July 15, 2013

तुझ बिन सूना सारा जीवन

अक्तूबर २००४ 
परमात्मा आकाश की नाईं खाली है और सागर की भांति भरा. उसकी ऊर्जा इस ब्रह्मांड के जर्रे-जर्रे में है, सब कुछ उसी ऊर्जा में ओतप्रोत है. वह आनन्द मय है,  ज्ञान मय और प्रेम मय है. हम भी उसके गुणों को धारण करते हैं, ध्यान में जब हम देह के पार होकर शुद्ध चैतन्य का अनुभव करते हैं, तब उसकी उपस्थिति का अनुभव करते हैं. हमें अपनी शाश्वतता का अनुभव होता है. हम भी उसी की भांति ज्योति स्वरूप हैं. वह नित्य है, सदा एकरस है, बल्कि उसका रस बढ़ता ही जाता है. उससे मिले बिना हमारा जीवन अपूर्ण है. कभी-कभी कुछ ऐसा होता है पल भर को हम देहातीत हो जाते हैं और उसकी झलक हमें मिलती है, उसकी याद बनी रहती है, पर संसार में उलझे रहकर वह स्मृति क्षीण हो जाती है. खुद से दूर हम बेबस की नाईं भीतर तपते हैं, फिर सत्संग से पुरानी स्मृति लौट आती है और हम परमात्मा की निकटता से उत्पन्न शीतलता का अनुभव करते हैं.     

7 comments:

  1. आपकी रचना कल बुधवार [17-07-2013] को
    ब्लॉग प्रसारण पर
    हम पधारे आप भी पधारें |
    सादर
    सरिता भाटिया

    ReplyDelete
    Replies
    1. सरिता जी, बहुत बहुत आभार !

      Delete
  2. सुन्दर चिंतन महा वाणी .देही अभिमानी बन अपने निज स्वरूप (ज्योति स्वरूप )में स्थिर हो ही उससे रूह रिहान कर सकते हैं .ज्योत से ही ज्योत जलती है .अ -शरीरी बनना पड़ता है तभी स्वयम के निरंतर स्वरूप आनंद प्रेम शान्ति का भान होगा .ॐ शान्ति .देह भान की रबर हटालो ईश्वर से मिलन मना लो .

    ReplyDelete
  3. महेंद्र जी व वीरू भाई आपका स्वागत व आभार !

    ReplyDelete
  4. फिर सत्संग से पुरानी स्मृति लौट आती है और हम परमात्मा की निकटता से उत्पन्न शीतलता का अनुभव करते हैं....

    ReplyDelete