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Wednesday, April 18, 2012

सबमें वही समाया है


साधना के आरम्भ में एक भक्त अथवा साधक के लिये उसका इष्ट ही एकमात्र आराध्य होता है, उसी में उसे सभी देवी-देवताओं के दर्शन होते हैं. जैसे वृक्ष की जड़ों को सींचने से उसके हर अंग तक जल पहुँच जाता  है वैसे ही एक की पूजा करने से सबकी पूजा हो जाती है. आगे जाकर वह सबमें उस एक को देखने लगता है. वह जान जाता है कि कहीं भी बंधना नहीं है, मुक्ति के पथ पर चलना शुरू किया है तो  जंजीर सोने की भी हो तो उसे कटवा देना चाहिए. सतोगुण तक जाकर उससे भी पार जाना होता है. अस्तित्त्व हमारी हर छोटी बड़ी इच्छा को पूर्ण करना चाहता है, पर हम उसका प्रतिदान नहीं दे पाते हैं. प्रेम हमें संसार की हर जड़-चेतन वस्तु के प्रति सजग बनाता है. परम को प्रेम करें तो वही प्रेम उसकी सृष्टि की ओर प्रवाहित होने लगता है.