जो एक रस है, अपार है,
सदा साथ है. जो जागृत है, प्रेममय है, सदा सुख है. जो सहज है, सदा पुकार दे रहा है,
सच्चा मित्र है, वही जीवन में बहार है. जो सदा खुला हुआ द्वार है, सबको समो लेता
है, जिसके बिना जीवन असार है. वही जीवन का आधार है.
Showing posts with label द्वार. Show all posts
Showing posts with label द्वार. Show all posts
Thursday, August 27, 2015
Wednesday, September 19, 2012
वही वही है चारों और
अगस्त २००३
हमारे हृदय सिंधु में से ही कृष्ण का जन्म होना है, अभी तक तो उसमें से विष ही
निकलता आया है, कुछेक रत्न भी निकले होंगे पर अमृत रूपी कृष्ण का निकलना अभी शेष
है. हमारे मन के कारागार में देवकी रूपी बुद्धि अभी कैद है जब कृष्ण प्रकट होंगे
तो कारागार के द्वार खुल जायेंगे और प्रकाश ही प्रकाश सब और फ़ैल जायेगा. वैसे तो कृष्ण
वहाँ अब भी हैं, वह तो कहीं जाते ही नहीं, हमारी ऑंखें ही देख नहीं पातीं, वह जो सहज
प्राप्त है, हवा, धूप, और बादलों की तरह, वह कृष्ण तभी मिलेगा जब मन को राधा बना
लें. प्यास गहरी हो ललक भरी तो वह हाजिर है तत्क्षण, उसे अपना बना लें तो वह छोड़कर
कहीं नहीं जाता, वह सदा के लिए वहीं वास करता है. वही तो मानव मन की सबसे बड़ी
आवश्यकता है, उसी की चाह है जो नए-नए रूप धर के सम्मुख आती है.
Subscribe to:
Posts (Atom)