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Tuesday, December 1, 2020

जब पावनता की ओर मुड़े मन

 जब हम जीवन को आदर और सम्मान से देखते हैं, एक पवित्रता का भाव मन में उसके प्रति जगाते हैं तो ही जीवन की विशालता का अनुभव कर पाते हैं। जब हमारे पूर्वजों ने नदियों को पवित्र माना, दूर्वा, तुलसी, बेल, पीपल आदि को पवित्र मानकर उन्हें सम्मान दिया तब इन वस्तुओं ने अपने गुणों से उन्हें लाभान्वित किया। धरती पूज्य है, आकाश आदि पंच तत्व सभी पावन हैं, जब हम यह शब्दों से ही नहीं मानते, हृदय से महसूस करते हैं तब  प्रकृति हमारे लिए माँ के समान सुख देने वाली प्रतीत होती है। जिस अंतर को जगत में  कुछ भी सम्मान के योग्य नहीं लगता, वह संकीर्ण मनोवृत्ति का शिकार हो जाता है। ऐसा जीवन रसहीन हो जाता है, उत्साह और उमंग के लिए उसे किसी न किसी साधन की आवश्यकता होती है। यदि जीवन में कोई खोज न हो केवल जीवन निर्वाह के सिवा जीवन का क्या अर्थ रह जाता है। जो व्यक्ति जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं को पूर्ण कर चुका है, ऐसे में उसके जीवन में एक खालीपन भर जाता है। संभव है यह प्रकृति द्वारा ही आयोजित किया गया हो, वह हरेक को एक उच्च लक्ष्य की ओर अग्रसर कर रही है। मानव मस्तिष्क को अपनी पूर्णता की ओर ले जा रही है। 

Tuesday, June 19, 2012

सिमटे बिखरा बिखरा सा मन


अप्रैल २००३ 
संतजन कहते हैं कि स्वयं को बिखेरो मत, स्वयं को गंवाओ मत, अपना अपमान करते हो जब स्वयं को मात्र शरीर मानते हो. मृत्यु के बाद भी सूक्ष्म शरीर जस का तस रहता है. ईश्वर ने यह खेल रचा है, और हम इस खेल में ही खो जाते हैं, खेल रचने वाले को भूल ही जाते हैं. हमारी आत्मा मन की कल्पनाओं के ढेर के नीचे सुप्त हैं, पर है वही जिसकी हमें तलाश है. मन जब संसार में बिखरता है तो उसकी ऊर्जा व्यर्थ ही नष्ट होती है, और भीतर जाने का सामर्थ्य घटता है. तैलवत् धार की तरह जब मन एक बिंदु पर केंद्रित रहता है तभी उसमें आत्मा की शक्ति परिलक्षित होती है. आत्मशक्ति का विकास व व्यवहार की शुद्दता हमें ईश्वर की ओर ले जाते हैं. सदगुरु कितने प्यार से हमें समझाते हैं कि नश्वर वस्तुओं के पीछे जा जाकर हम अपने जीवन में दुःख ही तो लाते हैं, हमारी सूझ-बूझ व्यर्थ हो जाती है. अन्तःकरण की पवित्रता और सौम्यता को तो प्रतिपल बहना है, तभी वह भीतर से आप्लावित रहता है.