आज समय जैसे ठहर गया है, आपदाएं पहले भी आती थीं, पर किसी दूसरे देश में, या किसी अन्य राज्य में, शेष जगह जीवन अपनी रफ्तार से चलता ही रहता था. सुनामी आयी, कई लोग प्रभावित हुए, शेष ने सहायता भी की, पर उस दर्द का अनुभव नहीं किया जो भुक्तभोगी कर रहे थे. लेकिन आज हमारी इस पृथ्वी पर कैसा संकट आया है जिससे कोई भी अछूता नहीं है, इतने सारे देशों में एक साथ एक वायरस ने आतंक फैला दिया है. किन्तु रात कितनी भी अँधेरी हो सवेरा होकर ही रहता है. यह समय जो आज ठहरा हुआ लग रहा है, एक दिन तरल होकर बहने लगेगा. जीवन फिर अपनी रफ्तार चलेगा, हाँ, एक अंतर होगा, शायद तब तक प्रकृति पहले से ज्यादा निर्मल हो जाये, वाहनों का प्रदूषण कम होगा, नदियों में रसायन नहीं बहेंगे. जंगल नहीं कटेंगे. मानव का चन्द हफ्तों का विश्राम प्रकृति के लिए वरदान बन सकता है. यह आपदा हमारे जीवन में अवश्य ही कुछ बदलाव देकर जाएगी, अवश्य ही हम इसमें से ज्यादा सबल होकर निकलेंगे.
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Tuesday, March 24, 2020
Monday, April 23, 2018
माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या:
२३ अप्रैल २०१८
पृथ्वी दिवस पर लोगों ने एक-दूसरे को शुभकामनायें दीं, कविताएँ लिखीं, लेख लिखे और इस कटु सत्य से अवगत कराया कि मानव ने पृथ्वी के साथ कितना गलत व्यवहार किया है, और आज भी कर रहा है. इसका दुष्परिणाम भी हमें ही भुगतना पड़ रहा है. प्रतिदिन हजारों की संख्या में प्लास्टिक तथा खतरनाक धातुओं अथवा द्रव्यों के द्वारा नये-नये उपकरण बन रहे हैं, खराब होने पर जिनको नष्ट करना कठिन होता है. मोबाईल फोन हो अथवा टेलीविजन आदि इलेक्ट्रोनिक उपकरण, इनका कचरा पृथ्वी को प्रदूषित ही नहीं करता, मनुष्यों के लिए भी हानिकारक है. विकास और व्यापार के नाम पर कितना बड़ा धोखा मानव अपने आप को दे रहा है. सडकों पर बेतहाशा ट्रैफिक के कारण हवा का प्रदूषण सीमा पार कर चुका है पर हर दिन नये-नये वाहन फैक्ट्रियों से लाये जा रहे हैं. बढती हुई जनसंख्या के साथ-साथ मानव का बढ़ता हुआ लोभ आग में घी डालने का काम कर रहा है. आवश्यकता है ऐसे नीति निर्माताओं की जो सदा जीवन, उच्च विचार की जीवन शैली को बढ़ावा देते हुए, मानव को प्रकृति की ओर लौट चलने को प्रेरित करें.
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