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Wednesday, February 7, 2018

बचपन और बुढ़ापा इक सा

८ फरवरी २०१८ 
एक कहावत है, पूत के पाँव पालने में ही देखे जाते हैं, अर्थात कोई बच्चा बड़ा होकर कैसा बनने वाला है, उसकी झलक बचपन में ही मिल जाती है. इसी कहावत को यदि थोड़ा आगे बढ़ाया जाये तो ऐसा भी कह सकते हैं कि किसी की युवावस्था देखकर उसकी वृद्धावस्था का अनुमान लगाया जा सकता है. यदि कोई अनुशासित जीवन जीता रहा है तो उसका बुढ़ापा भी अनुशासित ही होगा. इसी तरह कोई वृद्ध यदि संतुष्ट है और जीवन के प्रति आशावान है तो उसका नया रूप यानि अगला जीवन कैसा होगा, यह भी जाना जा सकता है. अक्सर हम वृद्धों को अपने बीते हुए दिनों की बातें करते देखते हैं, लेकिन जो बीत गया उसे दोहराना पानी पर लिखने जैसा है, जिसका कोई अर्थ नहीं. यदि वृद्ध अपने अगले बचपन के विषय में सोचे और उसकी तैयारी करे तो जीवन कितना सुंदर हो सकता है. बुढ़ापा बचपन की पूर्वावस्था ही तो है, बल्कि वृद्धावस्था में ही इसके लक्षण आरम्भ हो जाते हैं. पोपला मुख, बात-बात पर तुनकना और शारीरिक असमर्थता बच्चों में होती है और बूढों में भी. सन्यास आश्रम में गया वृद्ध बालवत् ही होता है, तभी वह सबका प्रिय हो जाता है.  

Sunday, April 6, 2014

सदा नया पन हो जीवन में

दिसम्बर २००५ 
शास्त्र पढ़ना इसलिए भी आवश्यक है कि जैसा-जैसा शास्त्रों में लिखा है साधक को जब वैसा अनुभव होता है तो उसका उत्साह बढ़ जाता है. सत्य एक ही है वह जिसके भीतर प्रकट होगा समान रूप से होगा, साधक वही है जिसका मन सदा जीवंत रहता है. सदा तृप्ति और उछाह से भरा. पता नहीं कब कौन सा सत्य किस रूप में आकर रास्ता दिखा जाये. जो सीखना चाहता है, हर पल उसके लिए नई सम्भावनाओं के द्वार खोल देता है. जीवन नित नया हो रहा है, इस नूतनता को अनुभव करना ही आनंदी भाव में स्थित होना है. यह सृष्टि कितनी पुरानी है पर हर नव शिशु के लिए सब कुछ एक बार फिर नया हो जाता है, साधक का मन भी बालवत् होता है. 

Sunday, March 10, 2013

चेतन अमल सहज सुख राशि


मई २००४ 
नन्हा बच्चा अपने भीतर की मस्ती से आनन्दित है, वह किसी भौतिक कारण के कारण सुखी नहीं है, पर दुखी वह किसी कारण से ही होता है.  मानव जब बड़ा होता है तो किसी कारण से ही सुखी होता है और दुखी बिना किसी कारण के ही होता है. कल्पनाओं के महल बनाकर वह स्वयं ही उन्हें गिराता है फिर आकुल होता है. प्रतिस्पर्धा की अग्नि में स्वयं को झुलसाता है, दिखावे की पीड़ा से गुजरता है. हम अकारण ही भयभीत होते हैं. और अपने भीतर के आनंद को ढक देते हैं. सहज उल्लास जो छह महीने के बच्चे में प्रकट होता है भीतर से, वही उस इंसान में भी प्रकट हो सकता है जिसने सारी तृष्णाओं का त्याग कर दिया है, जो पूर्णकाम है, उसके जीवन की बागडोर अब अस्तित्त्व के हाथों में है. वह सहज रूप से जीता है, तभी उस अकारण करुणानिधि उस परमात्मा की अहैतुकी कृपा का अनुभव उसे होता है. 

Thursday, January 10, 2013

माँ के जैसा ही वह है


जनवरी २००४ 
जैसे माँ बच्चे के रूप में अपना विस्तार करती है, फिर उसे प्रेम देती है व प्राप्त करती है, वैसे ही परमात्मा ने हमें सिरजा है, भक्त और भगवान के बीच प्रेम का आदान-प्रदान ही भगवत्ता को सार्थक करता है. जैसे बच्चे माँ को भुला देते हैं, वैसे ही हम परम को भूल जाते हैं, पर तब भी वह हमें चाहते हैं वह सदा प्रतीक्षा रत हैं कि हम उनके निकट जाएँ जैसे माँ को बच्चों की सदा एक आस बनी रहती है. हमारे भीतर के सद्गुण रूपी देवता उसी परमात्मा की आराधना करते हैं और दुर्गुण रूपी असुर उससे उत्पीड़ित होते हैं. शुभ-अशुभ दोनों को वह ही रचता है और दोनों से परे वह अव्यक्त है. वह हमारे भीतर तीन रूपों में विद्यमान है, क्रिया, ज्ञान और भावना. वही कर्म के लिए प्रेरित करता है, वही हमें हमारे होने का ज्ञान देता है ज्ञान जब भीतर रच-बस जाता है वही भक्ति में बदल जाता है. मुक्त हुए बिना भक्ति सम्भव नहीं. यह त्रिवेणी जब जीवन में उतरती है तो जीवन का हर क्षण सुंदर बन जाता है.