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Saturday, November 8, 2014

वर्तमान का पल ही अपना

अप्रैल २००७ 
कभी-कभी साधक को लगता है जैसे कुछ छूटा जा रहा है, लेकिन वह क्या है उस पर ऊँगली रखना कठिन है. भीतर एक बेचैनी सी होती है, मगर इतनी तीव्र भी नहीं, बस मीठी-मीठी आँच सी बेचैनी. उसे लगता है ईश्वर ने उसे इतना ज्ञान, इतना प्रेम और इतना समय दिया है उसका लाभ जग को नहीं मिल रहा है, वह तो हर पल सौ प्रतिशत लाभ में ही है. उसे ज्ञात हो गया है कि भुक्ति, मुक्ति और भक्ति ये तीन पदार्थ हैं, जिनमें से किसी को भी पाना है तो हमें वर्तमान में जीना शुरू कर देना चाहिए. जो भी घटित होता है वह वर्तमान में ही होता है. भूत हो चुका, भविष्य अभी हुआ नहीं. भूत में चिंता है, भविष्य में डर है, आनंद वर्तमान में ही है.