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Tuesday, February 18, 2014

एक हुआ जब मन वह प्रकटे

अगस्त २००५ 
ईश्वर की कृपा तो हर काल में हर किसी पर अनवरत बरस रही है, उसका लाभ लेने वाले को ही साधक कहते हैं. जब जीव स्वयं पर कृपा करता है तभी ईश्वर की कृपा फलीभूत होती है. मन को ही अहंकार का दुर्ग समझना चाहिए जो उस कृपा का अनुभव नहीं होने देता. मन ही वह दर्पण है जिसमें चेतना प्रतिबिम्बित होती है. मन यदि मलिन होगा तो चेतना भी मलिन ही प्रकट होगी, मन यदि बंटा हुआ होगा तो चेतना भी टुकड़ों में दिखेगी. मन का समाहित होना ही अपने-आप से जुड़ना है. मन को जब यह ज्ञान हो जाता है कि वास्तव में वह कुछ भी नहीं है, आत्मा की शक्ति ही उसके द्वारा प्रकट हो रही है, तो वह शांत होकर बैठ जाता है, जैसे चन्दमा के पास अपना प्रकाश नहीं है, वह सूर्य के प्रकाश से ही प्रकाशित होता है, वैसे ही मन भी आत्मा रूपी सूर्य पर आश्रित है और धरती रूपी शरीर के चक्कर काट रहा है. 

Monday, May 6, 2013

एक नाम ही अधारा...


सितम्बर २००४
हमारे जीवन में अध्यात्म का आना एक नियत समय पर होता है. इस ज्ञान को जिस क्षण हमने अपने हृदय में स्थापित कर लिया, उसी दिन से हमारे उद्धार की प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है. ज्ञान का आश्रय लेकर हम अपने इर्द-गिर्द बने झूठे आश्रयों से किनारा करते चलते हैं. हम जिस जगत का सहारा लेकर खड़े थे, वह तो स्वयं ही डगमगा रहा है, तो हमें क्या संभालेगा. ज्ञान ही सच्चा आश्रय है. ज्ञान तभी हृदय में टिकता है जब मन समाहित हो, वर्तमान में हो. एक हुए मन में कोई भेद नहीं रहता, तब विभिन्न नाम-रूपों में एक ही सत्ता के दर्शन होते हैं, तब कौन किससे चाहेगा या द्वेष करेगा. जब मन में कोई लहर नहीं उठती तब ही आत्मा अपना प्रकाश फैलाती है. व्यक्ति, वस्तु, परिस्थिति के प्रति सहज स्वीकार भाव हमारी ऊर्जा को बचाता है, जो मन को समाहित रखने में सहायक  होती है.