Showing posts with label असत. Show all posts
Showing posts with label असत. Show all posts

Wednesday, May 9, 2012

राह निहारे कोई कब से


मार्च २००३ 

‘भूल्या यदि आपनुं, तदी होया खराब’ जब हम अपने को ही भूल जाते हैं तभी अभाव हमें सताते हैं. भाव तो हम स्वयं हैं. सत्, सुख स्वरूप, चैतन्य, शाश्वत हम स्वयं हैं पर जड़, असत, दुःख स्वरूप नश्वर जगत में हम सुख ढूँढने जाते हैं, तनाव हमें घेर लेता है, ईश्वर की सत्ता हवा और धूप की तरह हमारे चारों ओर व्याप्त है. उसकी चेतना हमारे कण-कण में व्याप्त है. जीवन दुर्लभ है, सत्संग दुर्लभ है, पर हमें ये दोनों मिले हैं, ज्ञान की धारा बह रही है. जब उसने इतने सारे संयोग प्रदान कर दिए हैं तो कदम बढकर उस तक पहुंचने में बस हमारी ओर से ही देर है. वह हमारी राह तक रहा है, हम ही उससे आँखें चुराते हैं. सत् की अधीनता यदि मन स्वीकार कर ले तो असत् की अधीनता से मुक्त हो जाता है, और धीरे धीरे जब ज्ञान में स्थिरता आ जाती है, हम उसी एक भाव में टिकना सीख जाते हैं. इसके लिए बार-बार उसकी शरण लेनी होगी. अनवरत जब मन एक तरफ जायेगा तो एक धारा की तरह वह उधर ही मुड जायेगा.