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Sunday, July 5, 2020

गुरुर्ब्रह्मा: गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः


गुरु पूर्णिमा प्रत्येक साधक के लिए एक विशेष दिन है. अतीत में जितने भी गुरू हुए, जो वर्तमान में हैं और जो भविष्य में होंगे, उन सभी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन ! माता शिशु की पहली गुरू होती है. जीविका अर्जन हेतु शिक्षा प्राप्त करने तक शिक्षक गण उसके गुरु होते हैं, लेकिन जगत में किस प्रकार दुखों से मुक्त हुआ जा सकता है, जीवन को उन्नत कैसे बनाया जा सकता है, इन प्रश्नों का हल गुरुजन ही दे सकते हैं. इस निरंतर बदलते हुए संसार में किसका आश्रय लेकर मनुष्य अपने भीतर स्थिरता का अनुभव कर सकता है ? जगत का आधार क्या है ? इस जगत में मानव की भूमिका क्या है ? उसे शोक और मोह से कैसे बचना है ? इन सब सवालों का जवाब भी गुरू का सत्संग ही देता है. जिनके जीवन में गुरू का ज्ञान फलीभूत हुआ है वे जिस संतोष और सुख का अनुभव सहज ही करते हैं वैसा संतोष जगत की किसी परिस्थिति या वस्तु से प्राप्त नहीं किया जा सकता. गुरू के प्रति श्रद्धा ही वह पात्रता प्रदान करती है कि साधक उनके ज्ञान के अधिकारी बनें.

Friday, March 16, 2018

श्रद्धा का जब कुसुम खिलेगा


१६ मार्च २०१८ 
संत और शास्त्र के प्रति हृदय में श्रद्धा जगना परमात्मा की सबसे बड़ी कृपा है. संतों के रूप में परमात्मा ही इस धरा पर प्रकट होते हैं, उनका जीवन देखकर साधक प्रेरित होते हैं और स्वयं भी उसी दिशा की ओर चल पड़ते हैं. शास्त्रों के अध्ययन और सत्संग के द्वारा ही हृदय में नित्य-अनित्य, शाश्वत-नश्वर, सत्य-असत्य का विवेक जगता है, अनित्य के प्रति वैराग्य का जन्म होता है. मन में चिंता की जगह चिन्तन, मोह की जगह मनन का उदय होता है. बुद्धि हानि-लाभ की जगह समता में टिकने लगती है. मृत्यु का स्मरण करके अहंकार गलने लगता है और तब भीतर आत्मा का जागरण होता है. जीवन संघर्ष की जगह उत्सव बन जाता है और जगत के प्रति सहज मैत्री भाव बना रहता है.

Saturday, January 13, 2018

अग्नि सम उन्नत हो जीवन

१३ जनवरी २०१८ 
सत्संग, सेवा, साधना और स्वाध्याय इन चार स्तम्भों पर जब जीवन की इमारत खड़ी हो तो वह सुदृढ़ होने के साथ-साथ सहज सौन्दर्य से सुशोभित होती है. उत्सव बार-बार इसी बात को याद दिलाने आते हैं. हर उत्सव का एक सामाजिक पक्ष होता है और धार्मिक भी, यदि उसमें आध्यात्मिक पक्ष भी जोड़ दिया जाये तो उसमें चार चाँद लग जाते हैं. मकर संक्रांति ऐसा ही एक उत्सव है. इस समय प्रकृति में आया परिवर्तन हमें जीवन के इस अकाट्य सत्य की याद दिलाता है कि यहाँ सब कुछ बदल रहा है, भीषण सर्दी के बाद वसंत का आगमन होने ही वाला है. छोटे-बड़े, धनी-निर्धन आदि सब भेदभाव भुलाकर जब एक साथ लोग अग्नि की परिक्रमा करते हैं तो सामाजिक समरसता का विकास होता है. तिल, अन्न आदि के दान द्वारा भी सेवा का महत कार्य इस समय किया जाता है. जीवन की पूर्णता का अनुभव उत्सव के माहौल में ही हो सकता है. कृषकों द्वारा नई फसल को प्रकृति की भेंट मानकर उसका कुछ अंश अग्नि को समर्पित करने की प्रथा हमें निर्लोभी होना सिखाती है.     


Sunday, March 1, 2015

एक ललक उससे मिलने कीं

जनवरी २००८ 
खुश रहना या न रहना हमारे मन पर ही निर्भर है, मन बुद्धि पर, बुद्धि विवेक पर, विवेक सत्संग पर, सत्संग गुरू से मिलता है और गुरू भगवान की कृपा से... तो अंततः भगवान ही कारण हुए, पर भगवान ने तो हमने पूर्ण स्वतन्त्रता दी है, हम यदि ठान लें तो खुश रहने से कौन रोक सकता है, यह ठानना ही तो विवेक है न ? ध्यान से हमें भीतर एक ऐसे स्थान का पता चलता है जहाँ सहज ही ख़ुशी बसती है. ध्यान से भीतर की दुनिया की झलक मिलती है. जीवन तभी तो जीवन कहलाने योग्य है जब तक उसमें कुछ नया-नया अनुभूत होता रहे. नये फूल खिलते रहें, एक प्रतीक्षा बनी रहे भीतर, इस प्रतीक्षा में कितना आनंद है, प्रियतम से मिलने की ललक है, कुछ नया घटने वाला है, कुछ ऐसा मिलने वाला है जो आज तक नहीं मिला, जो अमूल्य है. परमात्मा की राह पर चलो तो हर क्षण उपहार मिलते जाते हैं और हर अगला उपहार पहले से बेहतर होता है.  


Tuesday, February 24, 2015

दूर भी तू पास भी तू

जनवरी २००८ 
हमें जीवन से जो भी चाहिए वह हमारे पास पहले से ही मौजूद है. जीवन के लिए जो भी चाहिए वह भी हमारे पास है, तो भी हम जीवन से क्या चाहते हैं कि सारी उमर बीत जाती है और हमारी तलाश खत्म नहीं होती. शायद इसलिए कि हमें इस बात का पता ही नहीं है कि जो खजाना हमारे पास है वह हमने गहरे गाड़ दिया है और ऊपर इतनी घास उग आयी है कि अब लगता ही नहीं कभी यहाँ खजाना रहा होगा. सत्संग के औजार से घास हटाने का कम शुरू होता है, झलक मिलने लगती है. भीतर शांति, आनंद व प्रेम का अनुभव होने लगता है, पर मजा तो तब है जब हम इन्हें संसार में बाँट सकें. अनंत खजाना है तो अनंत शक्ति भी होनी चाहिए. अध्यात्म की यात्रा कितनी विचित्र है, यहाँ विरोधाभास ही विरोधाभास है. एक पल में लगता है मंजिल करीब है फिर अगले ही पल लगता है अभी तो चलना शुरू ही किया है.  

Wednesday, August 13, 2014

चैतन्य को मीत बनाएं

जनवरी २००७ 
जब भीतर सत्संग की चाह जगे, निर्मोहता बढ़े, प्रेम जगे तो मानना चाहिए कि हरिकृपा बरस रही है. किसी ने कहा है,
इन्सान की बदबख्ती अंदाज से बाहर है
कमबख्त खुदा होकर इन्सान नजर आता है

कृष्ण कहते हैं कि जो चैतन्य के साथ स्वयं को जोड़ता है वह अपना मित्र है जो जड़ के साथ जोड़ता है वह अपना शत्रु है. नश्वर वस्तुओं को पाने में हम स्वयं को बड़ा मानते हैं तो यह छोटापन है, उनके खोने से दुखी हो जाते हैं यह भी दुर्बलता है. क्रोध, मान, माया, लोभ, मोह सभी जड़ हैं, किन्तु कोई दोष हममें है यह मानने से दोष दृढ़ हो जाता है. हमें उसे अपने में न मानकर प्रकृति में मानना है जो परिवर्तन शील है, वह दोष भी बदलने वाला है, जो उत्पन्न हुआ है वह नष्ट होने ही वाला है. अपने दोषों को देखना भर है साक्षी भाव में आते ही दोष मिटने लगते हैं.  

Sunday, May 25, 2014

एकै साधे सब सधे

मार्च २००६ 
लक्ष्य निर्धारित हो तो कोई भी कार्य असम्भव नहीं है. उस की प्राप्ति में जो कुछ भी हमें करना पड़े, जो भी सहना पड़े वह सदा कल्याणकारी ही होगा, किन्तु लक्ष्य ऐसा हो जो हमें आगे बढ़ाए, उन्नति के पथ पर, विकास के पथ पर, जो सभी के लिए हितकर हो. प्रभु प्राप्ति का लक्ष्य तो सर्वोपरि है, शेष सारे छोटे-मोटे लक्ष्य इसी में समा जाते हैं. ‘स्वयं’ को जानने का लक्ष्य भी इसी दिशा में ले जाता है. आनंद की खोज भी इसी दिशा में उठाया कदम है. सेवा, साधना, सत्संग व स्वाध्याय इस यात्रा में गति भरते हैं. 

Wednesday, November 27, 2013

स्वयं को ही उपहार बना लें

अप्रैल २००५ 
सत्संग से जीवनमुक्ति मिलती है. सहजता आती है. निर्मोहता, निसंगता तथा स्थिरमन की निश्चलता आती है. जीवनमुक्ति का अर्थ है अपने आस-पास कोई दुःख का बीज न रह जाये. दिव्य स्पंदनों का आभा मंडल इतना शांत होता है कि भीतर के विकारों से हमें मुक्ति मिल जाती है. सारी कड़वाहट खो जाती है, मन खिल उठता है. हम पुनः नये हो जाते हैं. वर्तमान यदि साधना मय है तो भावी सुंदर होगा ही. इस मन को शुभता से भर कर हमें जगत के लिए उपहार स्वरूप बनना है न की भार स्वरूप. वह अकारण हितैषी परमात्मा अनंत काल से हमें प्रेम करता आया है. हम उसे समझ न पायें पर उसके प्रेम को तो अनुभव कर ही सकते हैं . 

Monday, April 15, 2013

तू ही रस्ता तू ही मंजिल


जुलाई २००४ 
“रामकथा के तेहि अधिकारी, जिन्ह के सत्संगति अति प्यारी” रामकथा तत्वज्ञान भी कराती है, और भीतर तक शांति का प्रसार भी करती है. ‘संयम और अनुशासन’ का पाठ भी पढाती है, संयम और अनुशासन के दो पदत्राण जिसके पास हों उसे कांटे नहीं चुभते, जगत के रास्तों पर वह निर्भीक होकर चल सकता है. हमारे जीवन को सुखमय बनाने के लिए बाहरी साधनों की उतनी आवश्यकता नहीं है, जितनी भीतरी साधनों की. भीतर की यात्रा इतनी मधुर है और इतनी सुखद लेकिन उसके लिए जो उस पर चलना चाहता है. इस पथ के एक ओर सद्गुरु है और दूसरी ओर परमात्मा है, एक राह दिखाता है और दूसरा हाथ पकड़ कर लिए चलता है. इस रास्ते पर ‘संयम और अनुशासन’ के पदत्राण के साथ साथ भक्ति का छत्र भी चाहिए. हमारा लक्ष्य जब स्वयं ब्रह्मांड का नियंता है तो उस तक जाने का मार्ग भी उसी के अनुरूप ही होगा. उसे जानने की इच्छा जब किसी के हृदय में जगती है तो हृदय के कपाट स्वयं खुल जाते हैं, वह स्वयं ही फिर अपना पता बताता है, उसे और कोई नहीं जना सकता. वह जैसा स्वयं है वैसा ही अपने भक्तों को बना देता है.  

Wednesday, May 9, 2012

राह निहारे कोई कब से


मार्च २००३ 

‘भूल्या यदि आपनुं, तदी होया खराब’ जब हम अपने को ही भूल जाते हैं तभी अभाव हमें सताते हैं. भाव तो हम स्वयं हैं. सत्, सुख स्वरूप, चैतन्य, शाश्वत हम स्वयं हैं पर जड़, असत, दुःख स्वरूप नश्वर जगत में हम सुख ढूँढने जाते हैं, तनाव हमें घेर लेता है, ईश्वर की सत्ता हवा और धूप की तरह हमारे चारों ओर व्याप्त है. उसकी चेतना हमारे कण-कण में व्याप्त है. जीवन दुर्लभ है, सत्संग दुर्लभ है, पर हमें ये दोनों मिले हैं, ज्ञान की धारा बह रही है. जब उसने इतने सारे संयोग प्रदान कर दिए हैं तो कदम बढकर उस तक पहुंचने में बस हमारी ओर से ही देर है. वह हमारी राह तक रहा है, हम ही उससे आँखें चुराते हैं. सत् की अधीनता यदि मन स्वीकार कर ले तो असत् की अधीनता से मुक्त हो जाता है, और धीरे धीरे जब ज्ञान में स्थिरता आ जाती है, हम उसी एक भाव में टिकना सीख जाते हैं. इसके लिए बार-बार उसकी शरण लेनी होगी. अनवरत जब मन एक तरफ जायेगा तो एक धारा की तरह वह उधर ही मुड जायेगा.

Tuesday, November 29, 2011

सत्संग की महिमा


"अन्यों का हित चिंतन करें तो हमारा सामर्थ्य अपने आप बढ़ता है, जितना-जितना हम अन्यों की प्रशंसा करते हैं उतना उतना मन शांत होता है. मान भोगने की वस्तु नहीं है, देने की वस्तु है." सत्संग में कितने व्यवहारिक उपाय मिलते हैं. इसके बिना जीवन बिना पतवार की नाव के समान है. सत्संग हमें सामान्य मानव से ऊपर उठाकर सत्य के सम्मुख लाकर खड़ा कर देता है. परनिंदा व मीनमेख निकलने के लिये मन सदा तत्पर रहता है, इस आदत से मुक्त होना स्वयं के लिये ही अच्छा है. जब भी ऐसा होने लगे तो तारीफ ही करनी चाहिए. आखिर सभी में तो वह परमात्मा है जिसकी खोज में हम लगे हैं. सभी के भीतर तो उसी परम शुद्ध, निर्मल, अविकारी चैतन्य का वास है. ऊपर तो आवरण मात्र है और सभी को एक न एक दिन मुक्त होना है. सभी उस पथ के राही हैं.


Thursday, August 4, 2011

ईश्वर की खोज


 अगस्त २००१ 
जब हम उसे ढूँढते हैं तो वह हमें नहीं मिलता. पर जब हम ढूँढते-ढूँढते खो जाते हैं तो वह हमें ढूँढता है. ईश्वर के मार्ग की रीत बिल्कुल उलटी है यहाँ मिलता उसी को है जो छोड़ने को तैयार हो. हमें तो बस उसे याद करते जाना है, हमारी हर श्वास पर उसका अधिकार है, हमारे पास अभिमान करने जैसा कुछ है तो यही कि हमने मानव जन्म पाया है और सत्संग के द्वारा सत्य के प्रति आस्था मन में जगी है, अब इसको सार्थक करना या इसे व्यर्थ बिता देना हमारे अपने हाथ में है.

Thursday, June 9, 2011

सत्संग


मई २०००
किसी भी संवेदनशील हृदय को प्रकृति अपनी सुंदरता से मोह लेती है, फिर इस सुंदरता को रचने वाले के प्रति आकर्षण जगता है. इस तरह अनजाने ही आध्यात्मिकता का एक नन्हा सा बीज अंतर में बो दिया जाता है, मौसम आते जाते रहते हैं, कभी प्रतिकूलता मिलती है कभी अनुकूलता और अंकुर को पौधा बनने में बरसों लग जाते हैं, मनीषियों, ऋषियों, संतों और अवतारों के जीवन उनके सदुपदेशों के रूप में इस पौधे को जल और भोजन मिलता है और धीरे धीरे यह बढ़ने लगता है. यात्रा आरम्भ तो हो जाती है लेकिन इसे दिशा मिलती है सत्संग से.

Monday, May 30, 2011

ध्यान


मार्च २०००
ध्यान के लिये कई बातें जरूरी हैं, सबसे पहली तो अध्यात्मिक ज्ञान की पिपासा फिर सांसारिक बातों से उदासीनता, स्वाध्याय, सत्संग और नियमितता. नियत समय पर नियत विधि से लगातार जब ध्यान करेंगे तब परिणाम मिलेगा लेकिन परिणाम की आकांक्षा न रखते हुए ध्यान करना है. श्रद्धा दृढ़ न होने पर रास्ता बहुत लम्बा लग सकता है. जिस मार्ग पर बुद्ध, नानक, कबीर, महावीर चले थे उसी मार्ग पर चलना है, जाहिर है रास्ता बहुत कठिन है पर असम्भव नहीं. मन को संयत करना अभ्यास व वैराग्य से ही संभव है, जैसा कृष्ण ने कहा है. अपने कर्तव्यों का पालन( शरीर, घर-परिवार, समाज  के प्रति) करते हुए संसारिक लोभ व आकर्षणों से मुक्त रहने का प्रयास करना होगा, मध्यम मार्ग अपनाते हुए मानसिक विकारों को (क्रोध, लोभ, मोह तथा इच्छाएं), एक-एक कर दूर करते जाना होगा. मन जितना मुक्त होगा ध्यान उतना ही संभव होगा. किसी प्रकार की कोई अपेक्षा न रहे, सचेत रहना है. ईश्वर का ध्यान-भजन करते-करते ध्यान स्वयंमेव सिद्ध होने लगेगा.