Tuesday, November 29, 2011

सत्संग की महिमा


"अन्यों का हित चिंतन करें तो हमारा सामर्थ्य अपने आप बढ़ता है, जितना-जितना हम अन्यों की प्रशंसा करते हैं उतना उतना मन शांत होता है. मान भोगने की वस्तु नहीं है, देने की वस्तु है." सत्संग में कितने व्यवहारिक उपाय मिलते हैं. इसके बिना जीवन बिना पतवार की नाव के समान है. सत्संग हमें सामान्य मानव से ऊपर उठाकर सत्य के सम्मुख लाकर खड़ा कर देता है. परनिंदा व मीनमेख निकलने के लिये मन सदा तत्पर रहता है, इस आदत से मुक्त होना स्वयं के लिये ही अच्छा है. जब भी ऐसा होने लगे तो तारीफ ही करनी चाहिए. आखिर सभी में तो वह परमात्मा है जिसकी खोज में हम लगे हैं. सभी के भीतर तो उसी परम शुद्ध, निर्मल, अविकारी चैतन्य का वास है. ऊपर तो आवरण मात्र है और सभी को एक न एक दिन मुक्त होना है. सभी उस पथ के राही हैं.


8 comments:

  1. अनुपमा जी की हलचल पर आपकी पोस्ट देखकर बहुत प्रसन्नता मिली.
    आपके डायरी के पन्ने पढकर मन पवित्र हो जाता है,अनीता जी.

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  2. बहुत कम शब्दों मे सत्संग की सार्थकता बताई है आपने।

    सादर

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  3. परनिंदा व मीनमेख निकलने के लिये मन सदा तत्पर रहता है, इस आदत से मुक्त होना स्वयं के लिये ही अच्छा है.

    सार्थक सन्देश ...

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  4. बिल्कुल सच,
    मान भोगने की वस्तु नहीं देने की वस्तु है। सच है।
    वैसे कहते हैं ना बिन सत्संग विवेक ना होई......

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  5. बहुत सुन्दर शिक्षा.... प्रेरक और प्रभावी...
    सादर....
    हबीब(मित्र)

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  6. satya bachan..samay samay par aise bichar man ki bhramit ho rahi disha ko sahi marg par sthapit karte hain..sadar badhayee aaur amantran ke sath

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