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Thursday, June 29, 2017

ईशावास्यमिदं सर्व जगत्यां जगत

२९ जून २०१७ 
उपनिषद कहते हैं, यह सारा जगत परमात्मा से आच्छादित है. जड़-चेतन सभी कुछ उसी का है, उसी से है. हमें त्याग भाव से इसका भोग करना चाहिए, जैसे हम किसी होटल अथवा किसी के घर जाते हैं तो सभी सामानों का उपयोग करते हैं, वहाँ दिया भोजन भी ग्रहण करते हैं पर किसी भी वस्तु पर अपना अधिकार नहीं जताते. इस जगत में हमें वैसे ही मेहमान बनकर रहना है क्योंकि यह निश्चित है कि किसी भी क्षण इसे छोड़ना पड़ेगा. यदि आसक्ति वश हमने इसे अपना माना तो छोड़ते समय उतना ही दुःख होगा. त्याग भाव से भोगने का एक अर्थ यह भी हो सकता है कि हम मांगे नहीं, देने वाले बनें. देने का भाव यदि भीतर बना रहता है तो जीवन में कभी भी किसी वस्तु का अभाव नहीं रहेगा. 

Thursday, December 8, 2016

पूर्णमदः पूर्णमिदं

९ दिसम्बर २०१६ 
उपनिषद कहते हैं सृष्टि पूर्ण है, पूर्ण ब्रह्म से उपजी है और उसके उपजने के बाद भी ब्रह्म पूर्ण ही शेष रहता है, सृष्टि ब्रह्म के लिए ही है. इस बात को यदि हम जीवन में देखें तो समझ सकते हैं मन पूर्ण है, पूर्ण आत्मा से उपजा है अर्थात विचार जहाँ  से आते हैं वह स्रोत सदा पूर्ण ही रहता है, मन आत्मा के लिए है. विचार ही कर्म में परिणित होते हैं और कर्म का फल ही आत्मा के सुख-दुःख का कारण है. यदि आत्मा स्वयं में ही पूर्ण है तो उसे कर्मों से क्या लेना-देना, वह उसके लिए क्रीड़ा मात्र है. हम इस सत्य को जानते नहीं इसीलिए मात्र 'होने' से सन्तुष्ट न होकर दिन-रात कुछ न कुछ करने की फ़िक्र में रहते हैं. 

Monday, October 15, 2012

छुप गया कोई रे..


सितम्बर २००३ 
उपनिषदों के अनुसार पहले ‘एक’ था, ‘एक’ से अनेक हुए. उस ‘एक’ को अकेलापन खला होगा जो उसने अपने समान अनेकों को रचा. प्रकृति पर दृष्टिपात करके उसमे चेतना का संचार किया, एक विभु आत्मा से अनेकों अणु आत्माओं की सृष्टि हुई, जो उसके सान्निध्य में प्रसन्न थीं, फिर उसे एक खेल सूझा, आँख मिचौली का खेल. हमारी आँखों पर माया की पट्टी बांध दी और स्वयं को खोजने को कहा, सभी भिन्न-भिन्न स्थानों पर सुख, शांति, प्रेम व आनंद की तलाश करते हैं, क्योंकि यही तो उसकी पहचान है, पर वह बार-बार कहता है, “नहीं, मैं यहाँ नहीं हूँ”. मानव उसे बाहर खोजता रहता है पर वह छिप गया है उसके भीतर ही कहीं गहराई में. जो पट्टी खोलकर थोड़ी सी झलक पा लेता है, वह जान जाता है. उनका अनुभव यदि हमारा भी अनुभव बन जाये तो हम भी जान जायेंगे कि यह जो न मालूम सी प्यास हृदय में जगी है, यह जो उत्कंठा, व्याकुलता, यह जो कसक, कचोट, यह जो एक फांस सी दिल में अटकी है, यह उसी की चाहत है, हमारी आशाओं, आकाँक्षाओं का केन्द्र वही तो है, एकमात्र वही !