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Thursday, June 29, 2017

ईशावास्यमिदं सर्व जगत्यां जगत

२९ जून २०१७ 
उपनिषद कहते हैं, यह सारा जगत परमात्मा से आच्छादित है. जड़-चेतन सभी कुछ उसी का है, उसी से है. हमें त्याग भाव से इसका भोग करना चाहिए, जैसे हम किसी होटल अथवा किसी के घर जाते हैं तो सभी सामानों का उपयोग करते हैं, वहाँ दिया भोजन भी ग्रहण करते हैं पर किसी भी वस्तु पर अपना अधिकार नहीं जताते. इस जगत में हमें वैसे ही मेहमान बनकर रहना है क्योंकि यह निश्चित है कि किसी भी क्षण इसे छोड़ना पड़ेगा. यदि आसक्ति वश हमने इसे अपना माना तो छोड़ते समय उतना ही दुःख होगा. त्याग भाव से भोगने का एक अर्थ यह भी हो सकता है कि हम मांगे नहीं, देने वाले बनें. देने का भाव यदि भीतर बना रहता है तो जीवन में कभी भी किसी वस्तु का अभाव नहीं रहेगा. 

Thursday, March 12, 2015

समरसता हो भीतर बाहर

मई २००८ 
त्याग पर भोग हावी होता रहा तो पर्यावरण को संतुलित बनाये रखना बहुत कठिन होगा. अनावश्यक भोग भी न हो तथा अनावश्यक कर्म भी न हों, कहीं तो हमें विकास के लिए भी सीमा रेखा खींचनी होगी. जीने का सीधा सरल रास्ता हमें ढूँढ़ निकलना होगा, ऐसा रास्ता जो हमें कल्याण की ओर ले जाये. वह परम सुख ही हमारी मंजिल है. आज हम सब होने के बावजूद हम प्रेम से वंचित रह जाते हैं. प्रेम बाँटने में कंजूसी करते हैं और प्रेम स्वीकारने में भी झिझकते हैं. वास्तव में अहंकार कुछ है ही नहीं, प्रेम का अभाव ही अहंकार है और प्रेम का कभी अभाव होता ही नहीं. जैसे ही हम सजग होते हैं, दूरी मिट जाती है. वातावरण में एक समरसता भर जाती है. सारा जगत तब अपना लगता है, वस्तुओं को भी उपभोग करना छोड़कर उनका उपयोग करना सीखते हैं.  

Wednesday, March 14, 2012

आत्मा का पथ सुंदर है


जनवरी २००३ 
हमें यह सुंदर जीवन भोग के कारण दुःख उठाने के लिये नहीं मिला है, बल्कि योग के द्वारा अनंत शांति, प्रेम व आनंद को पाने के लिये मिला है. देवों और असुरों की तरह हमारा मन व आत्मा दोनों ही परमात्मा के हैं, असुर भी कोई कम शक्तिशाली तो थे नहीं, देवताओं को हरा देते थे, वैसे ही मन के प्रभाव में आकर हम विकारों के गुलाम बनते हैं, तृष्णाओं की आग में स्वयं को जलाते हैं. अब कंस और रावण के मार्ग पर चल कर कोई आनंद कैसे पा सकता है. फिर यह सोच कर खुद पर क्रोध भी आता है कि जीवन का अनमोल समय व्यर्थ बीता जा रहा है, सुख आज भी दूर है. मन के मार्ग पर चलेंगे तो अंत में सिवाय दुःख व बेचैनी के कुछ हाथ आने वाला नहीं है. तो मार्ग क्या है, यही कि मन को पहचान लें और जितनी जल्दी हो सके आत्मा के पथ के राही बन जाएँ, आरम्भ में सब अनजाना भले ही लगे पर अंत में परमात्मा ही मिलेंगे अर्थात आनंद, प्रेम, शांति, शक्ति, सुख, ज्ञान व पवित्रता...!