वे संस्कार जो हमें साधना के प्रति सजग करते हैं, हमारे भीतर हैं, ज्ञान के
प्रति यदि प्यास गहरी हो तो वे संस्कार जगने लगते हैं. जीवन मूल्य यदि श्रेष्ठ
हों, श्रद्धा और निष्ठा में कमी न हो तो कृपा अपने आप बरसती है. वाणी पर संयम न
हो, अज्ञान को स्वीकार करने की क्षमता न हो तो सत् हमारे जीवन से चला जाता है.
हमें स्वयं को खुद की कसौटी पर कसना होगा, एक छोटा सा प्रमाद हमें अपने पथ से
मीलों दूर कर देता है. मानव स्वतंत्र है ऐसा मानकर दुःख के काँटों में स्वयं को
उलझा लेता है. अपनी स्वतंत्रता का गर्व ही बंधन बन जाता है तो मुक्ति कहाँ ?
कर्मों के फल की कामना, इच्छा, और अन्यों से सुख की अपेक्षा, ये सब अपने परिणाम
साथ लेकर ही चलते हैं. यदि सजगता नहीं रही तो प्रफ्फुलता खो जाती है.