आज़ादी की क़ीमत पर जगत का कोई भी वैभव व्यर्थ है। आज़ादी का अर्थ क्या है ? स्वयं को एक ऐसा अनुशासन देकर जीना, जिससे खुद का या किसी अन्य का कोई अहित न होता हो। क्रोध से स्वयं का अहित होता है तथा वातावरण में भी हिंसा के परमाणु फैलते हैं। इसलिए यदि कोई आज़ादी के नाम पर हिंसा करता है तो वह सच्ची आज़ादी नहीं है। यहाँ योग के अनुशासन का पहला अंग ही भंग हो गया।मन का विश्राम भी भंग हो गया, मन सरल नहीं रहा, जटिल हो गया। यदि क्रोध करने के बाद भीतर पश्चाताप जगा तो संतोष नहीं रहा। स्वाध्याय और तप के द्वारा यदि कोई खुद को इस स्थिति का साक्षी मानकर देखे तो उसके जीवन में ध्यान घटित हो सकता है। भक्त के लिए ईश्वर की शरण में जाना सर्वोत्तम उपाय है। उसमें स्वयं को छोड़ देने का अर्थ है मन के पार जाकर उस एक तत्व से एकत्व महसूस करना, यही सच्ची आजादी या स्वतंत्रता है ।
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Sunday, April 16, 2023
Thursday, June 21, 2012
अज्ञान ही एकमात्र बंधन है
वे संस्कार जो हमें साधना के प्रति सजग करते हैं, हमारे भीतर हैं, ज्ञान के
प्रति यदि प्यास गहरी हो तो वे संस्कार जगने लगते हैं. जीवन मूल्य यदि श्रेष्ठ
हों, श्रद्धा और निष्ठा में कमी न हो तो कृपा अपने आप बरसती है. वाणी पर संयम न
हो, अज्ञान को स्वीकार करने की क्षमता न हो तो सत् हमारे जीवन से चला जाता है.
हमें स्वयं को खुद की कसौटी पर कसना होगा, एक छोटा सा प्रमाद हमें अपने पथ से
मीलों दूर कर देता है. मानव स्वतंत्र है ऐसा मानकर दुःख के काँटों में स्वयं को
उलझा लेता है. अपनी स्वतंत्रता का गर्व ही बंधन बन जाता है तो मुक्ति कहाँ ?
कर्मों के फल की कामना, इच्छा, और अन्यों से सुख की अपेक्षा, ये सब अपने परिणाम
साथ लेकर ही चलते हैं. यदि सजगता नहीं रही तो प्रफ्फुलता खो जाती है.
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