जुलाई २००८
प्रेम ही वह
सूत्र है जिसे पकड़कर हम ईश्वर तक पहुंच सकते हैं. तभी हम जानते हैं कि हम अस्तित्व
की उर्मियाँ हैं. इससे हमारा विरोध नहीं है. प्रेमपूर्ण होते ही हम ध्यानपूर्ण हो
जाते हैं, और ध्यानपूर्ण होते ही प्रेमपूर्ण ! जब हम स्वयं को आँख भर कर देखते हैं तो पाते हैं कि हम हैं ही नहीं, और
तभी पता चलता है परमात्मा है. ‘मैं’ हूँ यह हमारा सोचना ही आँखों पर पड़ा पर्दा है,
ध्यान में वही मिटता है, जो है ही नहीं, जो है वह कभी मिटता ही नहीं. जब तक मन अशांति
से ऊबे नहीं तब तक मन झूठ-मूठ ही खुद को बनाये रखना चाहता है. अहंकार की यात्रा जब
तक तृप्त नहीं होती तब तक ‘मैं’ नहीं मिटता.