Tuesday, May 15, 2012

जिन खोजा तीन पाइयाँ


मन के इस नगर में कहीं तो वह छुपा हुआ है, उसे खोजना है. बार-बार हमें उस पथ पर जानेके लिये उठना है, हम एक बार गिरे तो कहीं गिरते ही न चले जाएँ, यात्रा आसान नहीं है, मन जब उज्ज्वल होता है तभी रंग चढ़ता है. जहाँ-जहाँ वह अटके उसे लौटा लाना है, वह कहीं दूर नहीं है बस पर्दा उठाने भर की देर है. तब बुद्धि स्वतः उस शुद्ध स्वभाव में ठहरने लगती है. एक विचार उठा दूसरा अभी आने को है बीच का संधि काल उसी परमात्मा का शुद्ध ज्ञान है, उसी में टिकना है. श्वास को आते-जाते देखते समय भी मन ठहर जाये तो हृदय में ऋत उत्पन्न होता है.

3 comments:

  1. एक विचार उठा दूसरा अभी आने को है बीच का संधि काल उसी परमात्मा का शुद्ध ज्ञान है, उसी में टिकना है. श्वास को आते-जाते देखते समय भी मन ठहर जाये तो हृदय में ऋत उत्पन्न होता है.
    कमाल का चिंतन है! बहुत सही।

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  2. अनुपम भाव संयोजित किये हैं आपने ...आभार ।

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  3. दिगम्बर नासवा has left a new comment on your post "जिन खोजा तीन पाइयाँ":

    कोरे मन पे ही रंग चढ़ता है ... इसलिए उज्जवल तो रहना होगा ... उत्तम भाव ...

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    Posted by दिगम्बर नासवा to डायरी के पन्नों से at May 15, 2012 5:22

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