Tuesday, May 29, 2012

अमन हुआ जब प्रेम जगा


अप्रैल २००३ 
कृष्ण ने गीता में जो वचन दिए हैं वह उन्हें पूरी तरह निभाते हैं. वह हरेक के हृदय में प्रकट होते है, उसे अपनी उपस्थिति का अहसास बहुत तरह से कराते हैं. उन्हें जो प्रेम करता है उसे वह हर एक के भीतर दिखने लगते हैं और सारी सृष्टि उन्हीं के भीतर भासती है. वह इतने प्रिय हैं इतने आनन्ददायक हैं और उन्होंने हमें भी अपने सा बनाया है, हम ईश्वर का अंश हैं पर अज्ञान के कारण कृपण का सा जीवन जीते हैं. जब सदगुरु जीवन में आते हैं तब हमें अपनी वास्तविक स्थिति का कुछ-कुछ भास होता है. उर में प्रेम का उदय होता है, प्रेम के लिये प्रेम, फिर भक्ति का उदय होता है इस सुंदर सृष्टि को बनाने वाला कितना सुंदर होगा, उसके प्रति कृतज्ञता उमडती है, उससे मिलने की इच्छा बलवती होती जाती है तो वह स्वयं को प्रकट करता है. एक झलक पाकर प्यास और बढ़ जाती है, हास्य व अश्रु का खेल भीतर ही भीतर शुरू हो जाता है तब संसार के खेल तुच्छ प्रतीत होते हैं. मन आत्मा में ही रमण करने लगता है. आत्मा स्नेहिल है, वह शांति देती है, मन तब धीरे-धीरे अपनी सत्ता खोने लगता है वह भी प्रेममय होकर आत्मा में ही विलीन हो जाता है. हम मुक्ति का अहसास करते हैं. संसार हमें दे ही क्या सकता है, तब हम दूसरी दृष्टि से देखते हैं कि हम उसे क्या दे सकते हैं. तब अंतर में सेवा का भाव जगता है. बिना किसी प्रयोजन के हम तब कार्य करते हैं, निष्काम जीवन तब शुरू होता है.

4 comments:

  1. हम उसे क्या दे सकते हैं. तब अंतर में सेवा का भाव जगता है. बिना किसी प्रयोजन के हम तब कार्य करते हैं, निष्काम जीवन तब शुरू होता है.

    RECENT POST ,,,,, काव्यान्जलि ,,,,, ऐ हवा महक ले आ,,,,,

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  2. आत्मा स्नेहिल है, वह शांति देती है,
    JIWAN KA SAAR, NICHOD YAHI HAI.

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  3. सद्गुरु ही हमें मुक्ति का मार्ग दिखाता है।

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  4. बहुत ही सुन्दर व्याख्या ।

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