Saturday, May 26, 2012

बीज रूप है प्रेम अभी


अप्रैल २००३ 
स्वयं में जो प्रेम छिपा है उसे जागृत करने का नाम ही भक्ति है. उसके ऊपर एक आवरण छा गया है, एक दीवार खड़ी हो गयी है उसके और हमारे बीच, उसे गिराना है, छोटी-छोटी बातों से जो खिन्न न हो, भावनाओं के आवेग व आवेश जिस पर हावी न हों, सुख में जो अभिमान न करे, दुःख में जो विचलित न हो ऐसा मन उस प्रेम को शीघ्र जगा सकता है. वह प्रेम रसमय है, आनंद मय है, हमारी देह, मन बुद्धि, चित्त व अहंकार हैं तो सब उसी के आश्रय से लेकिन उससे बेखबर हैं, जैसे किसी की आँख पर चश्मा चढ़ा हो और वह उसे ही ढूंढ रहा हो.

7 comments:

  1. हमेशा की तरह बेहतरीन और शानदार लेख।

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  2. veerubhai has left a new comment on your post "बीज रूप है प्रेम अभी":

    वह प्रेम रसमय है, आनंद मय है, हमारी देह, मन बुद्धि, चित्त व अहंकार हैं तो सब उसी के आश्रय से लेकिन उससे बेखबर हैं, जैसे किसी की आँख पर चश्मा चढ़ा हो और वह उसे ही ढूंढ रहा हो.


    भक्ति प्रगट हो तो जीवन का आनंद आये लेकिन उससे पहले प्रेम का निराकार स्वरूप तो मुखर हो .बढ़िया विचार गंगा .शुक्रिया . .कृपया यहाँ भी पधारें -
    ram ram bhai
    शनिवार, 26 मई 2012
    दिल के खतरे को बढ़ा सकतीं हैं केल्शियम की गोलियां
    http://veerubhai1947.blogspot.in/तथा यहाँ भी ज़नाब -

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  3. खुबसूरत भाव भक्ति aur प्रेम का अद्भुत रूप

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  4. स्वयं में जो प्रेम छिपा है उसे जागृत करने का नाम ही भक्ति है.

    प्रेम का अद्भुत रूप

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  5. आप सभी सुधी जनों का स्वागत व आभार!

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