Friday, May 4, 2012

आत्म मंथन


जब जीवन में समस्याएं आती हैं, विपरीत परिस्थितियों का मुकाबला करने का अवसर आता है तब वास्तव में ईश्वरीय कृपा ही होती है. जब सब ठीक होता है तब भी उसकी दया होती है. मन यदि दोनों ही स्थितियों में सम रहे तो पावन होने लगता है. मन को तोड़ना नहीं मोडना है, वह या तो किसी न किसी चाह का चिंतन करेगा या समता का अनुभव करेगा. मन रूपी वासुकी को रस्सी बना, उसे शांति का लोभ देकर, हृदय रूपी मन्दराचल का मंथन करना है. तभी वह अमृत मिलेगा. आत्म मंथन से कई प्रसाद मिलेंगे पर अंत में परम शांति का अनुभव होगा. उसकी चाह करेंगे तो वह मिलेगा जग की चाह करेंगे तो जग मिलने का भ्रम ही देगा क्योंकि उसके साथ जुड़े हैं निराशा, दुःख, मोह, पीड़ा. परम के साथ सुख, शांति, आनंद, ज्ञान और प्रेम. वह प्रेम स्वरूप है जहाँ भी हाथ लगाएं वही हाथ में आयेगा,जैसे चीनी के पहाड़ को कहीं से भी चखें मीठा ही लगता है.


8 comments:

  1. आत्म मंथन से कई प्रसाद मिलेंगे
    पर अंत में परम शांति का अनुभव

    एक शाश्वत सत्य

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  2. बहुत सुन्दर है अनीता जी.....आत्म मंथन करते रहना चाहिए.....पर कभी लगता है की हमे संसार भी चाहिए और वो नश्वर प्रेम भी जबकि दोनों ही रस्ते अलग से लगते हैं.....क्या दो नावों के सवार के बीच में डूबने की आशंका नहीं रहती.....कबीर के इस दोहे का क्या अर्थ होगा -

    दुविधा में दोऊ गए न माया मिली न राम

    अगर हम नश्वर के लिए जाते हैं तो संसार छूटता जाता है और संसार में हैं तो मोह और माया से कैसे बचें ?

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    1. आपने लिखा है हमें संसार भी चाहिए और वह नश्वर प्रेम भी, शायद आप शाश्वत कहना चाहते थे, संसार और परम विपरीत नहीं हैं पर साधना काल में ऐसा लगता है, यदि आप एक ही नाव पर हैं और वह नाव है संसार तब भी तो डूबना ही है, ईश्वर के बिना संसार कितना सूना है, और यदि आप संसार को छोड़ कर केवल परम की ओर जाते हैं तब उसकी याद सताती है तो संत कहते हैं भागना नहीं है जागना है, देखना है कि मन रूपी नाव संसार रूपी जल में तैरती तो रहे पर उसमे जल न भर जाये, तभी तो डूबेगी. सीधी सी बात है जीवन में साधना हो,सेवा हो,सत्संग हो, और स्वाध्याय हो तो बाकी सब कुछ अपने आप होने लगेगा, जीवन केवल कमाना, खाना ही न बन जाये.सहज रूप से जो भी कर्तव्य आयें उनका पालन हो. मन को समता में रखने की कला हो. जहाँ समता है वहीं परम है.

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    2. कबीर के दोहे में साफ कहा है जहाँ दुविधा हो, जहाँ द्वंद्व हो, इसलिए सबसे पहले निश्चय पक्का होना चाहिए कि हमने पाना क्या है, सबको जग में रहते हुए सुख पाना है, जाग कर जियें तो ही सुख है, जागने के लिये ही साधना है.

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    3. आपकी बातों से पूरी तरह संतुष्ट हूँ अनीता जी एक दुविधा का अंत किया आपने सच कहा कि जागना है भागना नहीं जाग कर चीजें स्पष्ट होने लगेंगी......शुक्रिया।

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  3. आत्म मंथन में परम शांति ...ऊर्जा से भरपूर ..

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  4. आत्ममंथन कितना जरूरी है ... सार्थक चिंतन ...

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