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Friday, May 4, 2012

आत्म मंथन


जब जीवन में समस्याएं आती हैं, विपरीत परिस्थितियों का मुकाबला करने का अवसर आता है तब वास्तव में ईश्वरीय कृपा ही होती है. जब सब ठीक होता है तब भी उसकी दया होती है. मन यदि दोनों ही स्थितियों में सम रहे तो पावन होने लगता है. मन को तोड़ना नहीं मोडना है, वह या तो किसी न किसी चाह का चिंतन करेगा या समता का अनुभव करेगा. मन रूपी वासुकी को रस्सी बना, उसे शांति का लोभ देकर, हृदय रूपी मन्दराचल का मंथन करना है. तभी वह अमृत मिलेगा. आत्म मंथन से कई प्रसाद मिलेंगे पर अंत में परम शांति का अनुभव होगा. उसकी चाह करेंगे तो वह मिलेगा जग की चाह करेंगे तो जग मिलने का भ्रम ही देगा क्योंकि उसके साथ जुड़े हैं निराशा, दुःख, मोह, पीड़ा. परम के साथ सुख, शांति, आनंद, ज्ञान और प्रेम. वह प्रेम स्वरूप है जहाँ भी हाथ लगाएं वही हाथ में आयेगा,जैसे चीनी के पहाड़ को कहीं से भी चखें मीठा ही लगता है.