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Tuesday, December 24, 2013

राम रतन धन पायो

मई २००५ 
सोना तप कर ही कुंदन होता है, हम भी इस जगत में तपने आये हैं, हम सब का जीवन कुंदन सा चमके अर्थात सब का मंगल हो यही भावना होनी चाहिए. जगत पदार्थ से बना है, हम अपदार्थ हैं, पदार्थ की अवस्थाएं बदलती रहती हैं, पर अपदार्थ सदा एक सा रहता है, हम वही अबदल अविकारी तत्व हैं, हमारा नाश नहीं होता हममें परिवर्तन नहीं होता, पर हम स्वयं को मन, बुद्धि, अहंकार आदि पदार्थों के साथ एक करके देखते हैं, तपकर उन्हें अलग करना है और स्वयं को अपने शुद्ध रूप में पहचान लेना है. ऐसा होते ही भीतर कैसी शांति जगती है, कण-कण प्रेम से भर जाता है. पूर्णता का अनुभव होता है, भीतर कोई अभाव नहीं रहता. यह पूर्णता मौन को जन्म देती है. मन भी चुप हो जाता है, मन का मौन ही आत्मा का जन्म है. उसे एक बार पा लेने के बाद कभी विस्मरण नहीं होता, वह ऐसा रत्न है जो एक बार मिल जाये तो साथ नहीं छोड़ता. वास्तव में तो वह सदा ही मिला हुआ है, पर उसकी चमक खो गयी है, साधना की अग्नि में तप कर उसे पुनः प्रकाशित करना है. 

Thursday, August 29, 2013

हद, बेहद दोनों टपे

जनवरी २००५ 
हद टपे सो औलिया, बेहद टपे सो पीर
हद, बेहद दोनों टपे, ताको कहे फकीर

जैसे सोना आग में जाकर तपता है तो उसकी चमक बढ़ जाती है वैसे ही मन को जब साधना में तपाते हैं तो हम उस मूल तक पहुंच जाते हैं जिसे वेदों में गाया गया है. जिसे नेति-नेति कहकर अवर्णनीय कहा गया है. जो इस जगत का आधार है, इसे बनाता है, पालता है और नष्ट करता है. जो सत्य है, शिव है, सुंदर है. जो नित्य है, प्रेम है, आनन्द है. जो जानने योग्य है , पाने योग्य है. हमारे मन का भी वही मूल है. विचारों और भावों के रूप में मन की कई शाखायें हैं, उन पर कामनाओं के फल लगे हैं, हम ज्यादातर इन फलों में ही उलझे रहते हैं, कभी–कभी तने तक पहुंच जाते हैं, पर मूल तक पहुंचने के लिए हमें मनके पार जाना होगा. ध्यान तथा समाधि में हमें उस मूल की झलक मिलती है. और जिसने एक बार शांति रूपी गंगा जल पा लिए वह नाले के पानी का क्या करेगा, हीरा पाकर कोई कांच का टुकड़ा क्यों लेगा ? वह तो औरों को भी आनन्द रूपी हीरे को पाने के लिए प्रेरित करेगा.