Monday, September 15, 2014

कुछ देना न लेना मगन रहना

मार्च २००७
जैसी दृष्टि वैसी ही सृष्टि दिखाई पडती है. परमात्मा का नशा शेष सारे नशों को तोड़ देता है, इसका लक्षण है जागरण. परमात्मा को पाने की स्थिति कोई रूखी-सूखी नहीं है. यह प्रेम से भरी है. यह हरी-भरी है. यहाँ नाद है, गुंजन है. यह संपदा इतनी बड़ी है कि अहोभाग व्यक्त करना भी ओछा लगता है. तब मौन ही एक मात्र सहारा रह जाता है. यह मौन अपने भीतर बहुत कुछ छिपाए है. यह उदासीनता नहीं है, यह पूर्ण तृप्ति है. अब कुछ कहना शेष नहीं रह गया, कुछ पाना नहीं, कुछ जानना नहीं, कुछ जताना भी नहीं. बस गूंगे की मिठाई की तरह भीतर ही भीतर उस रस का अनुभव करते जाना. यह जग नहीं समझता क्योंकि जिसने पाया है वही तो जानेगा.


Monday, September 8, 2014

भीतर एक अछूता देश

मार्च २००७ 
क्रिया और पदार्थ दोनों से परे है आत्मा, हम कितना भी जप, तप, ध्यान आदि करें, सब मन व बुद्धि के स्तर तक ही रहेगा तथा पदार्थ तो वहाँ तक भी नहीं ले जाते जहाँ से मन व बुद्धि लौट-लौट आते हैं. वह अछूता प्रदेश है. वहाँ कुछ भी नहीं है, न कोई करने वाला न क्रिया, न दृश्य न द्रष्टा, केवल शुद्ध चेतना ही वहाँ है. वही शुद्ध चेतना, परमात्मा या आत्मा कहलाती है. वही चेतना जब संसार की ओर मुड़ती है तो जीवात्मा कहलाती है.


Friday, September 5, 2014

कैसा है यह जाल पसारा

फरवरी २००७ 
ज्ञान और भक्ति साथ-साथ चलते हैं. जब हमें आत्मा का ज्ञान होता है तो हृदय प्रेम से भर जाता है. आनन्द को कोई आनन्द से ही तो पूज सकता है. यह सारी प्रकृति उसी का रूप है जो हमें दिन-रात आनन्दित करने की चेष्टा करता है. वह स्वयं आनन्द स्वरूप है और आनन्द ही बिखेर रहा है. लेकिन हम अपने बनाये जाल में इतने मगन हैं कि उसकी ओर दृष्टि ही नहीं करते, वह हमें दुःख भी इसलिए देता है कि हम उससे उकता कर उसे देखें पर हमारी मूढ़ता की कोई सीमा नहीं है हम दुःख में ही सुकून ढूँढ़ लेते हैं. एक अजीब सी बेहोशी में सारा जगत डूबा हुआ है, जागकर देखता भी नहीं कि असल समस्या कहाँ हैं ?


Thursday, September 4, 2014

मुक्त हुआ जो वही सुखी

फरवरी २००७ 
जो चेतना स्वाधीन है, वह शांत है. जो चेतना पराधीन है वह बेचैन होती है. चाह हमें पराधीन बनाती है और जो काम हम बिना चाह के करते हैं वह भी पराधीन चेतना की निशानी है. अहंकार के लिए भी दूसरों पर निर्भर होना पड़ता है, आत्मसम्मान के लिए कोई अन्य नहीं चाहिए. भीतर से जो संतोष प्रकट होता है, रंजन की शक्ति होती है, वही स्वाधीन चेतना से झरती है.  


Tuesday, September 2, 2014

यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे

फरवरी २००७ 
यह सारा संसार एक विशाल कम्प्यूटर की तरह है, हम इसमें जो भी फीड करते हैं, हमें वही वापस मिलता है. सभी के प्रति जब हम सद्भावना रखेंगे तो हमें वही वापस मिलेगी  और यदि कोई दुःख हमारे जीवन में आता भी है तो वह हमारे ही पूर्व कर्मों का फल है. यह समष्टि प्रेम, शांति, आनन्द तथा ज्ञान स्वरूप है. ‘यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे’ के अनुसार जो समष्टि में है वही व्यष्टि में है. साधक के लिए संतों के वचन भीतर तक शीतलता पहुँचाने वाले हैं, जिन्हें सुनकर क्षण में वह अपने स्वरूप का अनुभव करता है.



भक्ति करे कोई सूरमा

फरवरी २००७ 
भक्ति स्वयं प्रकाशित है, वह मणि है, जिसे न हवा का डर है न उसे जलाने के लिए तेल चाहिए. जैसे ज्ञान के दीपक को जलाने के लिए स्वाध्याय का तेल चाहिए. अन्य सभी साधनों में भी निरंतर अभ्यास की आवश्यकता हैं क्योंकि साधक स्वयं पर निर्भर है पर भक्ति में उसका भार स्वयं प्रभु ले लेते हैं. उसे तो बस पूर्ण समर्पण करना है. जब भक्त पूरी तरह से उन पर निर्भर हो जाता है तब भगवान उसके दोषों की तरफ नहीं देखते. उसके प्रति प्रेम वह जल है जो  त्रितापों से हमें बचाता है. जिसे हम प्रेम करते हैं उसे सुख मिले भक्त के हृदय में यह भावना दृढ़ होती है तभी उसके भीतर प्रेम नित-नित बढ़ता जाता है.


Monday, September 1, 2014

ॐ नमः शिवाय


शिव हमारी आत्मा है, शिव का नंदी मानो हमारा शरीर है. शिव मन्दिर में प्रवेश करना हो तो पहले नंदी का दर्शन होता है, जिसका मुंह शिव की तरफ है पर मध्य में कछुआ है अर्थात अपनी इन्द्रियों को अंतर्मुख करके ही हम आत्मा तक पहुंच सकते हैं. मन्दिर का द्वार छोटा है सो झुक कर ही जाना होगा. शिव तत्व वह है जो पांचों भूतों में ओतप्रोत है, जो तीनों अवस्थाओं में व्याप्त है, जाग्रत, स्वप्न तथा सुषुप्ति का वह साक्षी है, तीनों से परे भी है. एक बार जो उसका अनुभव कर लेता है, निरंतर उसकी प्रतीति भीतर होती रहती है.