Friday, April 10, 2020

बदल रहा चलन दुनिया का

अब हम अपने जीवन के इतिहास को बताने के लिए समय को दो भागों में बाँट कर कहेंगे, पहला कोरोना वायरस के आने के पहले का काल और दूसरा उसके आगमन के बाद का. उदाहरण के लिए हम कहेंगे, जब वायरस नहीं पनपा था तब हम विदेश घूमने गए थे। उन दिनों हम सब एक साथ घूमने जाते थे, घरों में सामूहिक भोज का आयोजन करते थे. वर्तमान में हम इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते. लॉक डाउन खुलने के बाद भी हमारा जीवन पहले का सा नहीं रह जायेगा. अगले कई वर्षों तक हमें पूरी सावधानी रखनी होगी, हममें से जो भी बुजुर्ग हैं या किसी न किसी रोग से ग्रसित हैं, उन्हें तो विशेष रूप से घर पर रहने के लिए ही कहा जायेगा. बच्चे स्कूल जाने की अपेक्षा ऑन लाइन पढ़ना ज्यादा पसन्द करेंगे. पहले की तरह हम सामान्य रूप से मॉल, बाजार और प्रदर्शनियों में जाकर खरीदारी नहीं कर सकेंगे. बाहर निकलते समय मास्क पहनना सामान्य बात हो जाएगी. फ़िल्में भी सिनेमाघरों की बजाय ऑन लाइन ही रिलीज होंगी. घरों व सड़कों की सफाई  पर ज्यादा ध्यान दिया जायेगा. मन्दिरों में अब पहले की तरह भीड़ नहीं होगी, लोग नेट पर ही दर्शन करेंगे और घरों में पूजा करेंगे. योग और ध्यान जीवन का एक अभिन्न अंग बन जायेगा. विदेश यात्रा का मोह कम हो जायेगा और छात्रों में अपने ही देश में रहकर पढ़ने को बेहतर कहेंगे. पारिवारिक मूल्य फिर से स्थापित होंगे और अनावश्यक घूमना-खरीदारी बंद हो जायेंगे. लोगों में दूसरों की मदद करने की प्रवृत्ति बढ़ेगी और जीवन सरल और सादा होगा. 

Thursday, April 9, 2020

सदा रहेगा यदि कृतज्ञ मन


जीवन में कृतज्ञता का भाव जगे, इससे बढ़कर कुछ भी नहीं, दुःख से बचने का यह एक सरलतम उपाय है. जिन माता-पिता ने हमें जन्म दिया उनके प्रति तथा अपने पूर्वजों के प्रति जिसके हृदय में कृतज्ञता का भाव रहता है वह उनके आशीष बिन मांगे ही पाता है. हमारे भीतर उनका अंश है, हमारी जड़ें उनमें ही हैं, जितना -जितना हम भावनात्मक रूप से उनसे जुड़े रहेंगे उतना -उतना हम दूरदर्शी भी होंगे. इसके बाद अपने शिक्षकों व गुरुजनों के प्रति हृदय से आभारी होना है. जीवन के पथ पर चलने के लिए पग-पग पर हमें किसी न किसी की सहायता चाहिए, जिससे भी जितना भी सीखा है, उस हर आत्मा के प्रति कृतज्ञ होना है. कभी मित्रों ने हमने राह दिखाई, कभी पुस्तकों ने, कभी किसी घटना ने अथवा  किसी अनजान व्यक्ति ने ही अपने कृत्य या शब्दों से कुछ सिखाया, कभी-कभी उन सभी का आदर पूर्वक स्मरण करके आभार व्यक्त करना है. प्रकृति से भी हम कितना कुछ पाते हैं, सीखते हैं. इस जगत में सुबह से शाम तक हम अपने जीवन के लिए जिन-जिन पर आश्रित रहते हैं उन सभी के हम ऋणी हैं. जो व्यापारी हमें पदार्थ उपलब्ध कराते हैं तथा जो कृषक वे अन्न व वस्त्र उपजाते हैं, दोनों ही धन्यवाद के पात्र हैं. जो सफाई कर्मचारी सड़कें तथा हमारे घर साफ करते हैं, जो चिकित्सक हमारा इलाज करते हैं, जो सैनिक व सिपाही हमारी रक्षा करते हैं, जो अधिकारी व राजनीतिज्ञ देश की नीतियों का निर्धारण करते हैं, जो हमें  जीवनयापन के लिए नौकरी देते हैं, वे सभी हमारी कृतज्ञता के अधिकारी हैं. अपनी प्रार्थना में हर रोज उनमें से कुछ को शामिल करके हम अपने जीवन को सहज ही दुःख से मुक्त कर सकते हैं. 

Wednesday, April 8, 2020

साध सके जो मन का मौन


आज जबकि हम घरों में बंद हैं, एक कार्य जो हमारे शास्त्र, आचार्य और संत कहते आये हैं, बखूबी कर सकते हैं. वह कार्य है मौन की साधना. दिन भर में चाहे एक घन्टा ही सही, यदि हम पुरे मौन का पालन करें, तो अपनी बहुत सी ऊर्जा को बचा सकते हैं. उस एक घण्टे में हमें न केवल किसी अन्य से वार्तालाप नहीं करना है वरन अपने आप से भी नहीं करना है. जो मन सदा ही कुछ न कुछ योजना बनाता है अथवा पुरानी बात को सामने लाकर उस पर टीका-टिप्पणी करता है, उसे पूरा मौन करना सिखाना है. जो बात वह कई बार सोच चुका है, उसे जुगाली करने की उसकी आदत को तोड़ना है. किसी अप्रिय बात को स्मरण करके जो वह झुंझला जाता है, उसे भी छोड़ना है. वास्तव में अतीत में गया मन एक छाया के सिवा कुछ भी नहीं है, छाया को यदि मिटाना है तो प्रकाश की तरफ आना होगा, वर्तमान के प्रकाश में सारी छायाएं मिट जाती हैं. जो कहीं है ही नहीं हम उससे परेशानी खड़ी कर लेते हैं. जो अभी घटा ही नहीं उसकी आशंका मन जगाये तो फिर उसे वर्तमान में ले आना है और उसका सबसे सरल उपाय है, अपनी श्वास पर ध्यान देना. श्वास सदा वर्तमान में रहती है, वह परमात्मा से जोड़े रखने वाली डोरी है. डोरी भी ऐसी कि यदि श्वास एकतार हो जाये तो परमात्मा की सुवास उसमें से बहकर आने लगती है. शांति का एक बादल हमारे चारों ओर छाने लगता है. हाथ में आये इस समय में से नियमित मौन का अभ्यास करके हम आने वाले दिनों के लिए स्वयं को तैयार रख सकते हैं.  

Monday, April 6, 2020

अल्प से ही जो तुष्ट रहेगा


एक मुठ्ठी अन्न, अंजुरी भर जल और थोड़ी सी प्राणवायु क्या इतना ही पर्याप्त नहीं एक जीव को मानव की देह धारण के लिए. धरती पर वायु का अकूत भंडार है पर हम एक बार में कितनी श्वास  ले सकते हैं ? जल के कितने स्रोत हैं पर प्यास बुझाने के लिए एक बार में अल्प ही चाहिए. इसी तरह धरती पर अनाज के भंडार भरे पड़े हैं पर थोड़ा सा भोजन ही प्राणी की भूख मिटाने के लिए पर्याप्त है. सन्त कहते हैं जीव परमात्मा का अविनाशी अंश है, जब वह मानव देह लेता है तो उससे क्या सिद्ध करना चाहता है. हर कोई ख़ुशी ही तो चाहता है, जो परमात्मा का स्वभाव है, अर्थात परमात्मा के गुणों का प्रकाश उसके माध्यम से फैले, उसका प्रेम और आनंद जगत में प्रकाशित व प्रसारित हो, इतना ही तो उसका अभिप्राय है. सनातन धर्म में चार पुरुषार्थ कहे गए हैं, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष. धर्म की स्थापना के लिए अर्थ हो और मोक्ष की कामना जगे यही उनका अभिप्राय है. धर्म का अर्थ है किसी को दुःख देने की तिलमात्र भी भावना भीतर न हो, बल्कि दूसरों का भला चाहें. मोक्ष का अर्थ है तन या मन की गुलामी न करें. आत्मा जब धर्म के पथ पर होगी यानि मन का भाव शुद्ध होगा तो स्वतन्त्रता का अनुभव करेगी, यही तो मोक्ष है और हर जीव की यही आंतरिक पुकार है. हम थोड़े में सन्तुष्ट रहना सीखें, इस विपदा से यही सीखना है और यह समय बीत जाने पर भी इसी का  पालन करना है, तब कोई भारतवासी गरीब नहीं रहेगा. 

Sunday, April 5, 2020

आओ मिलकर दीप जलाएं


दीप जलाकर हम पूजा करते हैं, अतिथियों का स्वागत करते हैं, दीपावली मनाते हैं पर आज रात्रि जो दीपक हम जलाने जा रहे हैं उसके पीछे कितने ही कारण छुपे हैं. सबसे पहला कारण है भारत के नागरिकों की एकता और अखंडता की शक्ति का जागरण. संगठन में कितनी शक्ति है यह सर्वविदित है, जब हम सभी एक ही संकल्प लेकर दीपदान करेंगे तो उस संकल्प की शक्ति कितने गुणा बढ़ जाएगी, इसका अंदाजा अभी हम नहीं लगा सकते. मन एक ऊर्जा है, इसे सकारात्मक भी बनाया जा सकता है और नकारात्मक भी, जैसे एक ही विद्युत शक्ति से हम हीटर भी चलाते हैं कूलर भी, इसी तरह हमारे मन की शक्ति का उपयोग दोनों प्रकार से किया जा सकता है. सकारात्मकता और उत्साह आज हम सबकी सबसे बड़ी आवश्यकता है. जिस आपदा का सामना हम कर रहे हैं, उसे देख नहीं सकते, कब तक और कैसे उस पर विजय मिलेगी यह किसी को भी ज्ञात नहीं, ऐसे अनिश्चय के वातावरण में यदि हमारे मन सकारात्मक विचारों और शुभ भावनाओं से संयुक्त रहेंगे तभी हम अपना और अपने परिवार, समाज और राष्ट्र का तथा अंततः इस विश्व का कुछ भला कर सकते हैं. हर नकारात्मक विचार हमारी ऊर्जा को व्यर्थ ही नहीं करता उसे काटता भी है. अतः आज रात्रि नौ बजे हम सभी एक शुभ संकल्प हृदय में लेकर परमात्मा से प्रार्थना करेंगे और स्वयं की शक्ति को जगायेंगे. इसका सुखद परिणाम हमें निकट भविष्य में शीघ्र ही देखने को मिलेगा. 

Saturday, April 4, 2020

मन में जगे कामना शुभ की



परिस्थितियां कितनी भी दूभर हों, वे बाहर हैं. उनसे प्रभावित होकर सुख-दुखी होना भीतर है. बाहर की परिस्थिति पर हमारा वश नहीं चलता, मन की स्थिति कैसी हो इसका सारा उत्तरदायित्व हमारा है. मन यदि दुःख का निर्माण करेगा तो अपनी ही शक्ति का ह्रास होगा, उसका व्यवहार अपने ही विरुद्ध कहा जायेगा. मन यदि सुख का निर्माण करेगा तो समस्या का समाधान खोजने की शक्ति बनी रहेगी, समाधान न भी मिला तो भी वह अपना मित्र बना रहेगा. मन को इतना सबल बनाना हो तो बुद्धि को शुद्ध करना होगा, बुद्धि तभी निर्मल होगी जब वह अपने स्रोत से जुड़ी रहेगी. भगवद्गीता में कृष्ण कहते हैं, जो मन-बुद्धि से युक्त होकर मेरा स्मरण करता है वह सहज ही आनंद को उपलब्ध होता है. यदि मन में श्रद्धा हो तो उसका स्मरण सहज ही होता है और यह विश्वास बना रहता है कि एक न एक दिन यह आपदा भी गुजर जाएगी. उस दिन तक जो भी सहयोग हमसे बन पड़े करना है और एक क्षण के लिए भी स्वयं को बेबस नहीं मानना है. हर देशवासी की शुभेच्छा ही इस समय सबसे बड़ा उपाय है.

Friday, April 3, 2020

प्रेम की डोर ने बाँधा सबको



जीवन का सार है प्रेम, यह सारा ब्रह्मांड जिस एक तत्व के कारण अस्तित्त्व में आया है वह प्रेम ही है, धरती सूर्य की परिक्रमा करती है, चाँद धरती के चक्कर लगाता है, किस शक्ति के कारण, वैज्ञानिक उसे जो भी नाम दें वह आकर्षण शक्ति प्रेम का ही एक स्वरूप है. हमने प्रेम को एक कृत्य मान लिया था, हाथ मिलाना, गले लगाना, मस्तक या गाल चूमना और उपहार पकड़ाना ही प्रेम के पर्याय हो गए थे, अब इनमें से कुछ भी सम्भव नहीं है, किन्तु क्या दुःख की इस घड़ी में अब मानवीय संवेदना पहले से ज्यादा नहीं बढ़ गयी है. प्रेम कोई कृत्य नहीं है यह तो मानव के हृदय की उस संवेदना का नाम है जो वह अन्यों के प्रति अपने अंतर में महसूस करता है. दूसरे का सुख जब अपना सुख बन जाये उसका दुःख जब हमारी आँखों में अश्रु ले आए उसे ही प्रेम कहते हैं. इस आपदा काल में हम सभी भारतवासी एक ऐसी डोर से बंधे हुए हैं जो यद्यपि पहले भी हम सबको जोड़े हुए थी पर अपनी-अपनी सीमाओं में बंधे हम एक-दूसरे से दूर ही थे. इस आपदा का सामना हम सभी को मिलकर करना है, हमारे भाग्य एक हैं, हमारे कर्म भी यदि एक लक्ष्य को समर्पित हो जायँ तो इस आपदा से मुक्ति हमें शीघ्र ही मिल सकती है.