हमारी अपेक्षाएँ ही दुःख का कारण हैं, जैसे ही मन अपेक्षा से रहित हो जाता है,
प्रशांत अवस्था को प्राप्त होता है, ऐसी प्रशांति जो किसी बाह्य कारण पर निर्भर
नहीं है, जो तब उत्पन्न होती है जब मन भाव से भरा होता है, कृतज्ञता का भाव,
धन्यभागी होने का भाव, ऐसा भाव जो हमें संवेदनशील बनाता है, संवेदनशीलता अध्यात्म
की पहली सीढ़ी है, अन्यथा तो हम हृदयहीन कहलायेंगे. कोई भी सत्य हमें अपने मार्ग से
हटा नहीं सकता, वह आगे ही ले जाता है. मन में जो भी द्वंद्व उत्पन्न होते हैं वे
प्रेम के अभाव से ही होते हैं, प्रेम के लिए हमें प्रयत्न करना होगा, प्रेम संज्ञा
भी है क्रिया भी है. कृष्ण की नागलीला का वास्तविक अर्थ उसी प्रेम को भीतर जागृत कर
मन के द्वन्द्वों पर विजय पाना है. हमारा मन चाहे सजग न हो पर आत्मा सजग हो, अभी
बिलकुल उल्टा है, मन तो पूरी तरह तैयार है, पूरी सेना के साथ, पर आत्मा सुप्त है,
उसे अपने भीतर सजग करना है, विभिन्न कल्पनाओं ने न जाने कितने जन्मों में कितनी
बार हमें भरमाया है, पर अब और नहीं, विवेक को साधकर बुद्धि को तीक्ष्ण बनाना होगा
ताकि आत्मा तक पहुंचने का मार्ग बन सके.
Wednesday, October 31, 2012
Tuesday, October 30, 2012
मिले समाधि से समाधान
हम सभी एक विशाल
समष्टि के अंग हैं, इस नाते सभी एक-दूसरे से बंधे हैं पर हमारी अलग-अलग पहचान है,
जब यह पहचान भी नहीं रहती तब मन सारी सीमाओं को तोड़कर असीम में मिल जाता है. हममें
से हरेक की चेतना अनंत है पर हम छोटे-छोटे दायरों में बंधे होने के कारण उस
विशालता का अनुभव नहीं कर पाते हैं. समाधि की अवस्था में सम्भवतः ऐसा ही अनुभव
होता है, सारा का सारा ब्रह्मांड एक तत्व से बना है यह स्पष्ट होता है, फिर कोई
भेद नहीं, अद्वैत का अनुभव होने के बाद अंतर में राग-द्वेष नहीं रह सकते.
Monday, October 29, 2012
तज कर ही वह मिलता है
अक्तूबर २००३
वेणुगीत में गोपियों ने तेरह श्लोकों में कृष्ण की स्तुति की है, पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ,
पंच कर्मेन्द्रियाँ तथा मन, बुद्धि व चित्त ये तेरह तत्व हैं. जीव रूपी गोपी को
अहंकार तज कर इन तेरह को प्रभु में लगाना चाहिए. बुद्धि भी ऐसी जो प्रज्ञा में बदल
जाये वरना बुद्धि का अहंकार शेष रहेगा, अध्यात्म पथ पर चलने वाले को दुनिया,
स्वर्ग और यहाँ तक की परमात्मा की भी चाह छोड़ देनी होती है, फिर इस छोड़ने को भी
छोड़ना होता है वरना त्याग का अहंकार ले डूबेगा. जब कुछ भी करना शेष न रहे, मन,
बुद्धि सभी उस आत्मा में समाहित हो जाएँ तब जो रहता है वही परम सत्य है. उसे जानकर
यह जगत एक क्रीड़ास्थल ही बन जाता है लेकिन उस स्थिति तक पहुंचना भी की कृपा के
बिना सम्भव नहीं है, और वहाँ तक गए बिना प्रभु की कृपा मिलती भी नहीं. हमें प्रयास
करना होगा तभी कृपा मिलेगी पर कृपा मिले बिना प्रयास भी कहाँ सम्भव है, यह तो
विरोधाभास हुआ पर अध्यात्म के पथ पर सारे विरोधाभास नष्ट हो जाते हैं, वहाँ की
रीति, नीति जगत की रीति से अलग है. उस सच्चिदानन्द घन की कृपा अपार है और वह सब
पर, सब समय, समान रूप से बरस रही है, किसी विशेष स्थान पर वह विशेष प्रकट होती है.
संत उनके हृदय में बसते हैं. उन्ही संतों को हम पावन भाव से भजते हैं तो हमारे
हृदय भी पावन होने लगते हैं, और तब कभी न कभी हम भी उस विशेष कृपा के अधिकारी हो
जाते हैं.
Sunday, October 28, 2012
दिल का फसाना
बुराई की बहुत सारी शक्लें हैं, बहुत सारे चेहरे हैं, पर बुराई अपनी असली शक्ल हमें
नहीं दिखाती. वह सदा अच्छाई का लिबास ओढ़ कर आती है, उसमें इतनी हिम्मत नहीं कि
अपने असली रूप में सामने आये. हम जब असत्य बोलते हैं तो यही कहते हैं कि सत्य बोल
रहे हैं. बेईमानी करने वाला भी स्वयं को ईमानदार घोषित करता है. फरेब, धोखा, जुर्म
सभी इतने कमजोर हैं कि उनको करने वालों को उनसे कोई सहारा नहीं मिल सकता. विकारों
में उतनी ताकत नहीं जितनी संस्कारों में है. मानव का हृदय दोनों में से किसी की
आधीनता स्वीकार नहीं करता. दिल ही हमारा सच्चा निर्णायक है. वह हमारा साथ तभी तक
देता है जब तक हम सच्चाई के रास्ते पर चलते हैं, गलत कार्य करना तो दूर उसका विचार
ही हमारे दिल को बेकाबू कर देता है. वह धड़क कर हमसे शिकायत करता है, हमें टोकता
है, कचोटता है जिससे हम पुनः सही मार्ग पर आ सकें. अपने दिल पर यदि किसी की हुकुमत
चलती है तो वह है उस दिलबर कि जो सारी कायनात का मालिक है, जिसने इस खूबसूरत दिल
को बनाया है, यह खूबसूरत भी तभी तक है जब तक इसमें उसका निवास है.
Saturday, October 27, 2012
शिव ही सुंदर है
सितम्बर २००३
मन आखिर है क्या, कुछ
संकल्प-विकल्प, कुछ आशाएं, कुछ विरोध, कुछ इच्छाएं, सब मिला-जुला कर मन बन जाता
है. थोड़ा गहराई से देखें तो मन कुछ है ही नहीं, इच्छाओं को हटाते जाएँ तो संकल्प-विकल्प
भी नहीं बचते, किसी से कोई विरोध रहता ही नहीं, जब सभी कुछ इसी क्षण हमारे पास है
तो भावी की कोई योजना भी नहीं रहती. भूत तो मृत है और समय कितनी तेजी से व्यतीत हो
रहा है, हर नया क्षण आते ही पूर्व क्षण मृत हो जाता है, केवल वर्तमान का क्षण
हमारे सम्मुख है तो मन कहाँ गया, मन अमनी भाव में चला जाता है, जो शेष बचा वह
शांति है, परम शांति, परम आनंद, क्योंकि मन ही माया का वह पर्दा है जो हमारे असली
स्वरूप और हममें दूरी बनाये हुए है. पर्दा हटते ही आत्मा का सूर्य अपने पूरे वैभव
के साथ चमचमा उठता है, उसमें हजारों बिंब उभरते हैं, अनेकों स्वर्ण रश्मियाँ तथा
बिंदु उभरते हैं, उन रंग-बिरंगे बिम्बों के मध्य कई आकृतियाँ बनती हैं. उस सौंदर्य
का वर्णन नहीं किया जा सकता जैसे कोई फिल्म की रील चल रही हो, ऐसे अनेकों दृश्य
आते हैं जाते हैं, जगत भी ऐस ही है यहाँ हर क्षण जल के बुदबुदों की तरह कितने
प्राणी जन्मते हैं फिर नष्ट होते हैं. बनना, बिगडना और कुछ क्षणों के लिए स्थित
रहना यही जीवन है. यह अस्थायी है पर स्थायी प्रतीत होता है, इस अस्थायीरूप को यदि
हम सत्य मान लें तो हिस्से में दुःख भी आएंगे सुख के पीछे-पीछे. मन के पार ही परम
सुख है.
Friday, October 26, 2012
जिन ढूंढा तिन पाइयाँ
प्रभु अपने भक्तों को अपना दर्शन देते हैं, वे उसको अपना पता बताते हैं जो उनसे
पूछता है. वे उसके लिए अपना भेद खोल देते हैं जो उन्हें प्रेम करता है. वे हमारी
बुद्धि को प्रज्ञा में बदलते हैं. वे ही हमें इस क्रीड़ास्थल पर भेजते हैं और वे ही
इस खेल के नियम भी बतलाते हैं और परिणाम भी. हमें इसे खेल भावना से खेलना है तभी
हम इसका पूरा आनंद ले सकते हैं. लेकिन अन्ततः घर लौटना है, वह घर है उसका सान्निध्य, वहाँ पुष्ट होकर पुनः पुनः
इस जगत में आना होता है, पर जिसका मन इस खेल से भर जाये वह सदा के लिए उनके
सान्निध्य में रह सकता है. इसे ही निर्वाण कहते हैं. निर्वाण का अनुभव इस जगत में
भी हम करते हैं, गहरी नींद में जब हमें अपना भान नहीं रहता, हम प्रायः मृत ही हो
जाते हैं, पुनः जगते हैं अथवा जन्मते हैं. ध्यान में भी जब देह का भान नहीं रहे,
समय का पता न चले तब उसकी झलक पाते हैं. यह सब मौन में ही अनुभव होता है, अत्यंत
सूक्ष्म यह भाव टिकता नहीं पर इसकी स्मृति ही ताजगी से भर देती है.
Thursday, October 25, 2012
यहाँ दम दम पे होती है पूजा...
सितम्बर २००३
प्रतिपदा है नवरात्रि का शुभारम्भ, दुर्गापूजा का महोत्सव आरम्भ होता है इसी दिन से. अमावस्या
को पितरों को जल अर्पण करने का दिन. हमारी संस्कृति में मृतकों के प्रति सम्मान
दिखाने के लिए भी कितना आयोजन है, हम ही हैं जो अपनी शुभ संस्कृति को भूलते जा रहे
हैं. हमारे जीवन का जो परम लक्ष्य है, सभी शुभकर्म उस तक पहुँचाने में सहायक सिद्ध
होते हैं. किन्तु पूजा भी यदि सामान्य कर्म बन जाये तो उतना लाभ नहीं होगा जितना
तब यदि हमारे सारे कर्म ही पूजा बन जाएँ. हम भी कह सकें कि यहाँ दम दम पे होती है पूजा
सर उठाने की फुर्सत नहीं है....संतजन यही तो कहते हैं, हमें उनके ज्ञान के उजाले से
अपने भीतर उजाला भरना है, उनके वचन अनमोल मोतियों की तरह उनके भीतर के अकूत खजाने
से झरते हैं, यदि हम उसका शतांश भी ग्रहण कर सकें तो अपने लक्ष्य को पा सकते हैं. हमारे
जीवन को शुभतर तथा शुभतम बनाने के लिए जितने उपाय वह बताते हैं, वह अनंत ज्ञान सहज
ही उनके मुख से झरता है, उनकी आँखों से प्रेम झरता है तथा पोर-पोर से कृपा झरती है
यदि कोई भाग्यशाली उसे पा ले तो धन्य हो जाये. लेकिन गुरु का सान्निध्य विरलों को
ही मिलता है क्योकि वे ही उसकी आकांक्षा करते हैं, भौतिक दूरी अध्यात्म में कोई
मायने नहीं रखती यह भाव लोक है, जिसमें वे सदा हमारे साथ हैं, उनका प्रेम हमारे साथ
ही है, उसी से हमें अपने भीतर के ढके छिपे
ज्ञान को उभारना है, जोत जलानी है, अंतर के तिमिर को हरना है. माँ दुर्गा हमारे
विकार रूपी असुरों का दमन करें, जिससे शरद की शुभ्र चांदनी रूपी ज्ञान की ज्योति
जगमगा उठे.
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